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महाराजा गंगासिंह की विश्वविद्यालय की परीक्षाऐं फॉर्म भरने की तिथियों के साथ ही सिर पर आ चुकी है और हालात यह है कि न तो युनिवर्सिटी के पास बजट है और ना ही कप्तान के रूप मे वीसी बीकनेर, आज के जमाने में अनाथ का कोई नही होता है। शायद यही वजह है की उसकी परवरिश व सार संभाल में कमी रह जाती है और वह एक गलतियों का पुतला बन कर रह जाता है। कुछ ऐसे ही हालात हमारे जिले में बने महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के है जिसके लिए कई वर्षों तक आंदोलन चले हैं। भारी जद्दोजहद के बाद इसकी स्थापना तो कर दी गई लेकिन अब इसे संभालने वाला कोई नही दिख रहा है। इस कारण पिछले कुछ सालों से विश्वविद्यालय को अनेक समस्याओं से दो चार होना पड रहा है। कभी परिणामों मे अनियमितताएं तो कभी सरकार के सकारात्मक रवैया नही अपनाने की वजह से छात्र आंदोलन के लिए उतारू हो जाते हैं । विश्वविधालय में स्टाफ की भयंकर कमी के कारण कामकाज भी बुरी तरीके से प्रभावित हो रहा हैं। विवि के विकास के लिए यह एक बडी समस्या बनी हुई है। दुर्भाग्य इतना कि पिछले पाँच माह से कुलपति का पद भी रिक्त पडा है जिसका अतिरिक्त कार्यभार संभागीय आयुक्त को दिया गया है। विवि को अपने कार्यों के लिए संभागीय आयुक्त कार्यालय के चक्कर लगने पड रहे है। इतना ही नही जिन व्याख्याताओ को कॉपी जांच व पुनर्मुल्याकंन के लिए दी गई है वे भी समय रहते अपने कार्य नही कर रहे हैं। इससे परिणामों में देरी का खामियाजा भी छात्रों को भुगतना पड रहा है। पदों पर आसीन अधिकारी दबे स्वरों मे सरकार व स्थानीय नेताओं के असहयोग को विवि की दुगर्ति का कारण मानते हैं। वर्तमान कुलपति की नियुक्ति को लेकर अब ऐसा लगता है कि किसी जाति विशेष के कुलपति पद पर नियुक्त करने की बात को लेकर स्थानीय नेता व सरकार मे तनातनी बनी हुई है। जहां पुनर्मूल्याकंन के परिणाम भी अब तक घोषित नही किये गये है वहीं आगामी माह से परीक्षाएं फार्म भरने की तिथिया तक घोषित हो चुकी है। ऐसे मे एक लाख से ज्यादा छात्रों का भविष्य अधर मे लटकता हुआ दिखाई दे रहा हैं।
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