Tuesday, 26 January 2021

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तिब्बत आंदोलन को अमेरिकी समर्थनः रहमत या जहमत


तनवीर जाफरी, (सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी)

तिब्बत आंदोलन एक बार फिर विश्व के लिए चर्चा का विषय बन गया है। गत् दस मार्च को तिब्बत समर्थकों द्वारा तिब्बत की राजनधानी ल्हासा सहित कई अन्य देशों में भी उस समय प्रदर्शन किए गए जबकि तिब्बतवासी तिब्बत में चीन के शासन के विरुद्घ विद्रोह किए जाने की 49वीं वर्षगांठ मना रहे थे। इनमें राजधानी ल्हासा में हुआ प्रदर्शन हिंसक हो उठा। परिणामस्वरूप वहां मौजूद चीनी सैनिकों ने इस प्रदर्शन से निपटने की दमनकारी नीति अपनाते हुए निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चला दीं। अभी तक इस बात की सही पुष्टि ही नहीं हो सकी है कि चीनी सैनिकों द्वारा तिब्बती प्रदर्शनकारियों पर की गई गोलीबारी में वास्तव में दस बीस लोगों की मौत हुई है या फिर मृतकों की संख्या एक सौ या उसके आसापास है। चूंकि चीनी सरकार अपने देश में पनपने वाले किसी भी आंदोलन को दमनकारी तरीके से कुचलने के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती है इसलिए ल्हासा के प्रदर्शनों तथा चीनी सेना द्वारा की गई कार्रवाई की सही तस्वीर भी ल्हासा से बाहर अभी तक नहीं निकल सकी है। इस संबंध में बताया यह जा रहा है कि चीनी सैनिकों ने मीडिया को घटनास्थल पर हुई सैन्य कार्रवाई का विस्तृत ब्यौरा नहीं लेने दिया।
  बहरहाल, भारत; तिब्बत मुक्ति आंदोलन में तिब्बतियों का समर्थन करता है। केवल इतना ही नहीं बल्कि भारत के राज्य हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला शहर के समीप मैकलॉडगंज नामक स्थान पर तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा तथा तिब्बत की निर्वासित सरकार भी शरण लिए हुए हैं। इसके अतिरिक्त भी तिब्बतियों को भारत में अनेकों विशेष सुविधाएं दी गई हैं ताकि वे यहां अपना जीविकोपार्जन आसानी से कर सकें। यहां तक कि तिब्बत को भारत द्वारा सहयोग व समर्थन दिया जाना चीन को फूटी आंख नहीं भाता। परन्तु उसके बावजूद भारत अपनी विश्व बन्धुत्व की नीति पर चलता हुआ एक ओर तो तिब्बत आंदोलन को समर्थन देना भी जारी रखे हुए है तो दूसरी ओर चीन से भी भारत के संबंध पहले की तुलना में अधिक बेहतर होते जा रहे हैं। भारत ने तिब्बत आंदोलन को हमेशा अपना मूक एवं नैतिक समर्थन तो अवश्य दिया है तथा देता भी रहेगा। परन्तु इस आंदोलन को लेकर भारत ने कभी जलती आग में घी डालने का काम हरगिज नहीं किया। भारत ने जिस प्रकार महात्मा गांधी के सत्य व अहिंसा के सिद्घान्त पर चलते हुए गांधीजी के नेतृत्व में अहिंसक आंदोलन एवं सत्याग्रह करते हुए देश को आजादी दिलाई, तिब्बत आंदोलन के नेता दलाई लामा से भी भारत वैसी ही उम्मीद करता आ रहा है। यहीं नहीं बल्कि स्वयं दलाई लामा भी शांति, अहिंसा, प्रेम व भाईचारे के इतने बडे पक्षधर हैं कि आज उन्हें भी दुनिया के चंद गिने चुने शांतिदूतों में प्रमुख माना जाता है।
  1॰ मार्च को ल्हासा में चीनी सेना व तिब्बती प्रदर्शनकारियों के मध्य हुई हिंसक भिडंत की भी दलाई लामा ने निंदा की तथा हिंसक प्रदर्शनकारियों का हौसला बढाने वाला एक भी शब्द नहीं कहा। इतनी बडी घटना के बावजूद दलाई लामा ने तिब्बती प्रदर्शनकारियों को शांतिपूर्ण एवं अहिंसक विरोध करने की ही सलाह दी। जबकि दूसरी ओर चीन इन प्रदर्शनकारियों को भडकाने के लिए दलाई लामा को ही जिम्मेदार ठहराता रहा। हालांकि तिब्बती लोग प्रत्येक वर्ष चीनी शासन से मुक्ति पाने हेतु चीन सरकार के विरोध में प्रदर्शन करते हैं परन्तु इस वर्ष ल्हासा में हुई हिंसक घटना तथा उसके बाद चीनी सैनिकों द्वारा की गई कार्रवाई ने न सिर्फ पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया बल्कि दुनिया के सबसे बडे थानेदार समझे जाने वाले अमेरिका ने भी आनन-फानन में इस जटिल एवं पेचीदा होते जा रहे विवाद में अपनी पूर्ण आहूति दे डाली।
  ल्हासा में चीनी सैनिकों द्वारा की गई गोलीबारी का मानो सबसे अधिक दुःख अमेरिका को ही हुआ हो। अमेरिका में प्रतिनिधि सभा की अध्यक्ष नैन्सी पलोसी की भारत यात्रा हालांकि पूर्व निर्धारित  थी तथा ल्हासा की घटना का इस यात्रा से कोई संबंध नहीं जोडा जा सकता। परन्तु इत्तेफाक से उनकी यात्रा के समय ही घटी इस घटना ने तो गोया अमेरिका को भारत की सरजमीन पर ही चीन के विरुद्घ जहर उगलने का मौका ही दे दिया। अमेरिकी नेता नैन्सी पलोसी ने धर्मशाला में जाकर तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा से भेंट की तथा उनके आंदोलन के प्रति अमेरिकी सहानुभूति व्यक्त की। इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने पूरी दुनिया के आजादी चाहने वाले लोगों का आह्वान किया कि ‘वे तिब्बत मुक्ति आंदोलन के समर्थन में चीन के विरुद्घ अपनी आवाज बुलंद करें। पलोसी ने कहा कि यदि दुनिया के लोग अब भी चीन के विरुद्घ नहीं बोले तो वे मानवाधिकार के विषय में कुछ कहने का अपना नैतिक अधिकार भी समाप्त कर देंगे। उनका साफ कहना था कि यदि दुनिया में आजादी चाहने वाले लोग चीन के दमनचक्र के बारे में तथा तिब्बत के विषय में अब भी बात नहीं करते तो हमें दुनिया में कहीं भी मानवाधिकारों के बारे में बात करने का कोई अधिकार नहीं होगा।’ पलोसी ने कहा कि इस दुःखद समय में अमेरिका तिब्बत के लोगों के साथ है। वे इस बात को लेकर भी व्यथित नजर आईं कि तिब्बत में हो रही घटनाओं की वास्तविकता दुनिया के सामने नहीं आ पा रही है। इससे पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडालिजा राइस ने भी चीनी नेताओं से अनुरोध किया था कि वे तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा के साथ वार्तालाप का दौर शुरु करें।
  उधर इन ताजातरीन घटनाओं पर चीन ने भारत के रुख की तो सराहना की है परन्तु अमेरिकी नेता के वक्तव्य पर अपनी सख्त प्रतिक्रिया भी व्यक्त की है। चीन ने कहा कि ‘तिब्बत चीन का अंदरूनी मामला है तथा वह किसी भी देश, व्यक्ति अथवा संगठन की ओर से चीन के अंदरूनी मामलों में दखलअंदाजी बर्दाशत नहीं करेगा। चीन अपने अंदरूनी मामलों में दखल देने की इजाजत किसी को नहीं देता है। किसी भी देश, संगठन या व्यक्ति को तिब्बत की स्थिति के बारे में गैर जिम्मेदाराना हरकत नहीं करनी चाहिए तथा इस विषय पर गैर जिम्मेदाराना शब्दों का भी प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। चीन में समस्या पैदा करने की सभी कोशिशें नाकाम रहेंगी।’ यह चीनी प्रतिक्रिया तिब्बत पर अमेरिकी नेताओं की ओर से आने वाली प्रतिक्रिया विशेषकर नैन्सी पलोसी के दलाई लामा से मिलने के पश्चात दिए गए उनके बयान के मात्र 24 घंटे के भीतर दे दी गई थी।
  अब अन्तर्राष्ट्रीय राजनैतिक विश्ा*ेषकों के समक्ष तिब्बत को लेकर और भी कई प्रश्ा* खडे हो गए हैं। मसलन अमेरिका द्वारा तिब्बत आंदोलन को समर्थन दिए जाने का मकसद दरअसल क्या है? तिब्बतियों के प्रति हमदर्दी या चीन के लिए परेशानी खडा करना? ऐसे में जबकि दलाई लामा की दुनिया में पहचान ही एक शांति व अहिंसा के दूत के रूप में बन चुकी है, अमेरिका अथवा जिम्मेदार अमेरिकी नेता आखिर तिब्बतियों को किस प्रकार का सहयोग व समर्थन देना चाहते हैं? यहां तक कि ल्हासा की हिंसात्मक घटनाओं की भी दलाई लामा ने निंदा की है। जिस प्रकार अमेरिकी नेता पूरी दुनिया में आजादी के समर्थकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं, ऐसे में भारत; कश्मीर मुद्दे को लेकर अमेरिका से आखिर कैसी नीति अख्तियार किए जाने की उम्मीद कर सकता है? अमेरिका द्वारा तिब्बती आंदोलन को दिया जाने वाला समर्थन चीनी नेताओं की सोच में कैसा परिवर्तन ला सकता है? हजारों मील दूर बैठे अमेरिका के तिब्बत के गम में बहने वाले आंसू वास्तविक हैं या घडियाली? तथा इराक व अफगानिस्तान सहित पूरी दुनिया में मानवाधिकारों की सबसे अधिक धज्जियां उडाने वाले अमेरिका को क्या वास्तव में यह अधिकार है कि वह चीन के विरुद्घ मानवाधिकार के परचम को बुलन्द करे? सैन्य दमन का भी जो प्रदर्शन अमेरिकी सेना द्वारा किया जाता है, उसकी दूसरी मिसाल आखिर कहां देखने को मिलती है?
  चीन तिब्बत के मध्य तिब्बत की आजादी अथवा उसकी सम्पूर्ण स्वायत्ता जैसा जो भी विवादित मुद्दा है, वह निश्चित रूप से अत्यंत गंभीर व संवेदनशील है। भारत सरकार का तिब्बत को समर्थन था और जारी भी रहेगा। परन्तु किसी को समर्थन दिए जाने का उसे फायदा ही मिलना चाहिए, उसे नुकसान हरगिज नहीं होना चाहिए। परन्तु यदि अमेरिका तिब्बत आंदोलन को अपना समर्थन देने की बात करता है तो इस अमेरिकी समर्थन का अवश्य बडी बारीकी से अध्ययन किए जाने की जरूरत है। यह सोचना नितांत आवश्यक है कि तिब्बत को दिया जा रहा अमेरिका का मौखिक समर्थन तिब्बतवासियों के लिए रहमत का सबब बन सकता है या जहमत (परेशानी) का। इतना ही नहीं बल्कि दुनिया को यह भी सोचना चाहिए कि विवादास्पद स्थिति में अमेरिकी समर्थन पाने वाले देशों की वर्तमान स्थिति आखिर क्या है?


तनवीर जाफरी - [email protected]