Sunday, 25 June 2017

बीकानरे की रम्मतें: आनन्दित करने का जादू आज भी कायम

बीकानरे की रम्मतें: आनन्दित करने का जादू आज भी कायम

कल देर रात्रि बिस्सों के चौक मे होली से दो दिन पूर्व होने वाली रम्मत का अन्तिम रियाज मे जाने का अवसर मिला।  रम्मत अर्थात किसी गंभीर विषय को नाट्य मंच के माध्यम से श्रृंखलाबद्ध काव्य संवादों ख्याल और लावळी से परिपूर्ण कथानक को नाटकीय रूप से पेश करने का पारम्परिक माध्यम जिसमे जनमानस के लिए शिक्षापद्र सन्देश हो।  परकोटे से घिरे बीकानेर शहर के लगभग हर प्रमुख मौहल्लें मे कोई न कोई प्रासंगिक विषय के साथ खुले मंच पर  से पिछले साढ़े तीन सौ सालों से यह रम्मतें प्रदर्शित की जाती रही है और आज आठ पीढि़या के बाद भी उसी जोश, अंदाज और अदायगी के साथ यह अनवरत जारी है।


यह रम्मते सवांद अदायगी, नाट्य कला और संगीत स्वरों से परिपूण होती है, इसमे विशेष बात यह होती है कि यह ऐसे कलाकरों, सचू कहूं तो ऐसे गैर कलाकरों, व्यक्तियों द्वारा पूर्ण की जाती है जो साल के 11 माह मे ऐसी कोई कला का प्रदर्शन या अभ्यास नही करते है जो सवांद, नाट्य या संगीत से जुड़ा हो, मुख्यतः ये कलाकार गैर कला क्षेत्र से होते है।  होली से 25 दिन पूर्व बंसत पंचमी से ये अपना अभ्यास शुरू करते है और होलाष्टक तक आते   इनका अभ्यास परवान पर होता है। कला से इतर दिन भर अपने जीविकोपार्जन मे लगे यह लोग  रात्रि 9 बजे से देर रात्रि एक और दो बजे तक अभ्यास करते है और होली होलाष्टक से होली पर्व के एक दो दिनो पूर्व ही अलग अलग मौहल्लों मे यह मंचित होती है।

मैं जब वहां पहुंचा तो  वहां पुत्र पूरनमल और सौतेली मां फूलनदे के बीच सवादं चल रहा था - 


चम्मन हो रहा चमाचम, मचा दे छैल छमा छम, गर्क हो गुल गुलशन है, 
हां हां तेरी खाऊं मिलाले, अपना दिल मोमन है। 


ये सवादं मुख्य पात्र पूरनमल पर ही उसकी सौतेली मां अगन से सम्बन्ध बनाने की आतुरता दिखलाती है लेकिन पूरनमल जो कि वीर, संयमि और धर्मपारायण पुत्र के रूप मे अपने आप को पेश करता है तु मेरी मासी है कुछ भी कर ले मे ये सम्बन्ध नही बनाउंगा, लाख मिन्नतों और धमकियों के बाद नायक शास्त्रोक्त स्त्री और मां के दर्जे को समझाने का प्रयास करता है जिसमे कहता है कि 


जो कुछ पतिवृत धर्म का, है धर्म वेद मे बयान
तुझको समझाउं वही सुन माता धरि ध्यान
सुन ले पतिवृता के शुमार होती है
उत्तम, मध्यम, लघु अधम चार होती है
मेरी मात वही उत्तम पतिवृता है  . . .  

. . . स्त्री और पुरूष की मर्यादाऐं उल्लेखित करते और भी ऐसे कई धर्मोक्त संवाद चलते रहते है और लोग आनन्द विभोर मे डूबे रहते है।


आज जहां थियेटर से जुड़ा संजीदा कलाकार जो दिन रात मेहनत करके अलग अलग विषयों और कथानकों के माध्यम से सैकड़ों हजारों लोगों के बीच अपनी कला का प्रदर्शन करना चाहता है, लेकिन तमाम तरह के प्रचार-प्रसार और मार्केटिंग के फण्डे लगा लेने के बावजूद थियेटर के सामने वाली खाली कुर्सियों को देख कर मन मसोस कर रह जाता है वहीं इन कलाकारों को न केवल हजारों की तादाद मे भरपूर दर्शक मिल जाते है, बल्कि वहां मौजूद हर कोई उस प्रदर्शन मे अपने आप को शरीक ही मानता है, रम्मत के उन कलाकरों द्वारा दिये जाने वाले संवादों को टेरिये के रूप मे दोहराते हुए आनन्द परमआनन्द की अनुभूति करता है, और यह जोश और ताजगी साल दर साल बरकार रहती है। 


दर्शकों का तो आलम यह रहता है कि डागा चौक, आचार्यो चौक, मौहत्ता चौक, बारह गवाड़ जैसे प्रमुख मौहल्लों मे इन रम्मतों के मंचन के दौरान  विशेष समय पर पैर रखने तक की जगह नही होती।  आस पास के मौहल्लों से आई हुई महिलाऐं और छोटे बच्चे के साथ ही बड़ी तादाद मे पुरूष वर्ग  पूरी रात जागकर इन रम्मतों का मजा लेते है और यह रम्मतंे मेले सा स्वरूप ले लेती है जहां पर दैनिक बिक्री वाले खाद्य और खिलौने वालें ठेला चालक जीभरकर बिक्री करके खुश हो जाते है।


इन रम्मतों के कलाकार, संगीतकार, वादकों के तैयार होने की प्रक्रिया भी बड़ी असामान्य सी ही है और वो है रियाज के दौरान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के मातहत रहकर सर्वप्रथम सवांद और संगीत की अनुभुति करना, फिर कुछ साल हाथ आजमाना और जब सभी टेरियों और प्रशंसकों द्वारा प्रस्तुती का लोहा मान लिया जाता है तब जाकर मिलता है छोटे पात्रों के मंचन से  दर्शकों से मुखातिब होने मौका। अर्थात क्वालिटी पर पूरा कंट्रोल। 


रियाज के दौरान ही मैं मिला अविनाश बिस्सा से, पन्द्रह वर्ष और नवीं मे अध्ययनरत यह बालक जो बहुत ही पारंगत तरीके से पारम्परिक वाद्य नगाड़े को   तन्मयता से बजाने मे लीन था। मैं तीन वर्ष पूर्व भी उससे मिला था जब वो इस नाटक के सवांदों की अभ्यास कर रहा था, उस वक्त भी उसका जोश और सवांद पेशगी बड़ी ही जोरदार और कला पारखियों को आकर्षित करने वाली थी। इसकी एक बानगी संक्षिप्त वीडियों के रूप मे यहां उपलब्ध है।


होलाष्टक से होली पर्व तक प्रतिदिन कहीं ना कहीं यह रम्मतें डागा चैक मे उस्ताद रमणसा बिस्सा द्वारा शुरू की गई दो कथानकों चरित्र और भक्ति के गुणों को उजागर करती भक्त पूर्णमल और वीरता के उजागर नौटंकी शहजादी मे से हर वर्ष किसी एक का मंचन होता है, आचार्यो चैक मे उस्ताद मेघराज आचार्य द्वारा शुरू की गई वीर और श्रृंगार रस से ओत-प्रोत अमर सिंह राठौड़  की, बारह गुवाड़ चैक मे फक्कड़दाता, दासी महाराज की स्वांग मेहरी, किकाणी व्यासों के चैक मे जमनादास कल्ला की स्वांग मेहरी रम्म्त, मरूनाय चैक, भट्ड्डों का चैक मे हेड़ाऊ मेहरी की ख्याल और लावळी से सजी प्रासंगिक  मुद्दें उठाती रम्मतें होती है।


उपर उस्ताद शब्द का प्रयोग किया जो इस बात को भी विशेष उल्लेखित करता है कि यह रम्मतें अखाड़ा व्यवस्था से उद्भवित है जहां दिल और दिमाग की उपयोगिता के बजाय दिनभर हाड और मांस को मजबूत करने सरीखी बातों पर जोर दिया जाता है, और ऐसे ही लोग साल मे एक बार दिल और दिमाग की उपज पेश करें तो और भी चैलेंजिग जैसा कार्यक्रम हो जाता है।

पूरा लेखनी पढ़ लेने के बाद निश्चित रूप से मैं यह कह सकता हूं कि आप को लगेगा कि ऐसी क्या कला है जो इतना लिखा गया है, तो मैं तो अपनी शब्दों को यही विराम देकर इतना ही कहना चाहूंगा कि आप पारिवारिक लोगों ने अखबरों और टीवी के विज्ञापनों के बूते आधुनिक जीवनशैली से सम्बन्ध रखने वाले देशी-विदेशी आकर्षकों  को देखकर आनन्द लिया होगा!  कला और अध्ययनकर्ताओं ने विभिन्न क्षेत्रों का दौरा और अध्ययन किया होगा, और कई खिलदंड लोगों ने बैंकोक, थाईलेण्ड , लास वेगास की रोशनियां, स्पेन के टोमेटो वाॅर और बुल फाइट देखी होगी लेकिन एक बार बीकानेर आकर यहां की होली का यह रंग भी जरूर देखे, जिसमे व्यक्तित्व निखार की शिक्षा है, कला अदायगी है और हां होली है तो कहीं ना कहीं नाटकीय पूर्णता के लिए लम्पटता भरे इशारें भी देखने को मिल जाये।