Saturday, 16 January 2021

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संकट में पाकिस्तान


तनवीर जाफरी, (सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी)पाकिस्तान, हालांकि 1947 में अपने अस्तित्व में आने के बाद कई बार राजनैतिक अस्थिरता का शिकार हो चुका है। लोकतांत्रिक सरकार को भंग कर फौजी शासकों द्वारा सत्ता को हथिया लेना तथा लेकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित प्रधानमंत्री को फौजी शासकों द्वारा अपदस्थ कर उन्हें फांसी पर लटका देना या देश निकाला दे देना अथवा उन्हें जेल में सडते रहने की धमकी देकर देश छोडकर चले जाने के लिए मजबूर करना जैसी बातें पाकिस्तान के लिए एक साधारण राजनैतिक घटनाक्रम बनकर रह गया है। इसके अतिरिक्त भी पाकिस्तान जिन विडम्बनाओं का शिकार है, उनमें 1947 में विभाजन के समय भारत छोडकर पाकिस्तान चले जाने वाले मुसलमानों अर्थात् मुहाजिरों (शरणार्थियों) को स्थानीय लोगों द्वारा दूसरी श्रेणी के नागरिक के रूप में देखना, रूढीवादी इस्लामी विचारधारा विशेषकर जमात-ए-इस्लामी से संबंध रखने वाले मुसलमानों द्वारा अन्य वर्गों के मुसलमानों को गैर मुस्लिम समझते हुए उनके विरुद्घ हिंसात्मक कार्रवाइयां करना अथवा ऐसा करने हेतु अपने अनुयाईयों को प्रोत्साहित करना जैसी बातें शामिल हैं।
  आज पाकिस्तान के हालात उपरोक्त कारणों से ऐसे बन चुके हैं कि एक बार फिर वहां राजनैतिक अस्थिरता का ऐसा वातावरण देखा जा रहा है जो सम्भवतः पहले कभी नहीं देखा गया। रूढीवाद, कट्टरपंथी विचारधारा, दूसरे धर्मों व विश्वासों के लोगों के प्रति अपने दिलों में नफरत रखना तथा ऐसी प्रवृत्ति को बढावा देना आदि बातों ने पाकिस्तान को आज उस मोड पर ला खडा कर दिया है जिससे कि न सिर्फ पाकिस्तान की निष्पक्ष सोच रखने वाली आम जनता चिंतित व भयभीत है बल्कि यह विषय पाकिस्तान के पडोसी देशों सहित अमेरिका तक के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। पाकिस्तान को कट्टरपंथ की राह पर ले जाने का पूर्व फौजी शासक जिया-उल-हक का प्रयास आज परवान चढ चुका है। पूरी दुनिया की नजर में इस समय पाकिस्तान कट्टरपंथी इस्लामी विचारधारा रखने वाले रूढीवादियों तथा आतंकवादियों का गढ बन चुका है। ऐसा नहीं है कि केवल पडोसी देश भारत अथवा अफगानिस्तान ही पाकिस्तान में शरण पाने वाले तथा वहां प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले आतंकवादियों की गतिविधियों से परेशान हैं। दरअसल अब तो हालात ऐसे नजर आ रहे हैं कि यही जेहादी आतंकवादी अब पाकिस्तानी शासकों के नियंत्रण से भी बाहर हो चुके हैं। आज नहीं तो कल इनसे सबसे अधिक नुकसान स्वयं पाकिस्तान का ही होने की भी सम्भावना है।
पिछले दिनों पाकिस्तान की लाल मस्जिद में चला दुर्भाग्यपूर्ण ऑप्रेशन सनराईज यह समझ पाने के लिए काफी है कि पाकिस्तान आखिर किस खतरनाक मोड पर पहुंच गया है। खासतौर पर लाल मस्जिद पर हुई सैन्य कार्रवाई के बाद से लेकर अब तक उसी विचारधारा के आतंकवादी संगठनों द्वारा जिस प्रकार से पाकिस्तान में चुन-चुन कर फौजी लक्ष्यों को निशाना बनाया जा रहा है, उससे भी यह जाहिर हो जाता है कि अब इन जेहादी आतंकवादियों की शक्ति का इतना विस्तार हो चुका है कि इन्हें आसानी से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। पिछले दिनों अफगानिस्तान में आतंकवादियों के विषय में जो रिपोर्ट जारी की गई, उससे भी यह साफ हो गया कि इनमें सबसे अधिक आतंकवादी पाकिस्तान से संबंधित थे या उन्होंने पाकिस्तान में प्रशिक्षण प्राप्त किया था। अब तो इस बात का भी शक जाहिर किया जा रहा है कि अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लाडेन भी पाकिस्तान में ही कहीं न कहीं पनाह लिए हुए है।  बहरहाल उपरोक्त हालात यह समझ पाने के लिए काफी हैं कि पाकिस्तान इस समय बारूद के उस ढेर पर बैठा हुआ है जो कभी भी विस्फोटक रूप धारण कर सकता है। ऐसे में सबसे बडी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की चिंता का विषय यह है कि यदि पाकिस्तान की सत्ता पर कट्टरपंथियों का कब्जा हो गया अथवा जेहादी मानसिकता रखने वाले आतंकवादी पाक सत्ता पर अपना प्रभाव जमा पाने में सफल हो गए तो ऐसे हालात में पाकिस्तान में मौजूद परमाणु हथियारों का आखिर क्या होगा? बात-बात में मरने व मारने जैसा अमानवीय जज्बा रखने वाले तथा दूसरों को जहन्नुम की राह दिखाने व स्वयं को जन्नत का दावेदार कहने वालों के हाथों में यदि परमाणु शस्त्र चले गए तो आखिर इन्हें किस हद तक सुरक्षित समझा जा सकता है। यह विषय इस समय पूरी दुनिया के लिए चिंता का कारण बना हुआ है।
पाकिस्तान में राजनैतिक अस्थिरता के इस वातावरण के बीच वहां सत्ता संघर्ष का जबरदस्त खेल भी शुरु हो चुका है। जनरल परवेज मुशर्रफ द्वारा आतंकवादियों के विरुद्घ की गई कार्रवाई से नाराज रूढीवादियों तथा चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी की बर्खास्तगी के बाद पाकिस्तान के बिगडे माहौल तथा जस्टिस चौधरी की पुनः बहाली से जनरल मुशर्रफ को पहुंचे झटके का लाभ उठाकर सात वर्षों से निर्वासित जीवन बिता रहे पूर्व पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भी पाकिस्तान की वापसी का नाटक रचकर जनरल मुशर्रफ के समक्ष और अधिक समस्याएं खडी करने की कोशिश की है। उधर बेनजीर भुट्टो ने भी पिछले दिनों जनरल मुशर्रफ के साथ कुछ ऐसी बातें चलाईं जिनसे कि वे भी पाकिस्तान की वर्तमान सत्ता में अपनी असरदार भूमिका निभा सकें। परन्तु बात सिरे न चढ पाने की वजह से फिलहाल इन दोनों नेताओं में राजनैतिक संधि नहीं हो सकी। निश्चित रूप से केवल पाकिस्तान में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में ही जनतांत्रिक सरकारें सत्ता में होनी चाहिएं।
तानाशाहों की सरकारों के परिणाम आमतौर पर ठीक नहीं देखे गए हैं। परन्तु इसमें भी कोई शक नहीं कि जनरल मुशर्रफ ने पाकिस्तान में कट्टरपंथियों के विरुद्घ जिस प्रकार की आक्रामक मुहिम छेडने की शुरुआत की है वह भी अब तक पाकिस्तान के किसी शासक ने नहीं किया। न ही लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित किसी प्रधानमंत्री ने और न ही मुशर्रफ के पूर्व के किसी फौजी शासक ने। हां इतना जरूर है कि इस्लामी कट्टरपंथियों के विरुद्घ जनरल मुशर्रफ द्वारा छेडे गए अभियान के लिए उनपर यह आरोप जरूर लगाया जा रहा है कि वे यह सब कुछ अमेरिका के दबाव में आकर कर रहे हैं। चूंकि इस समय न सिर्फ पाकिस्तान बल्कि दुनिया के और भी अधिकांश देशों में जनभावनाएं अमेरिका विशेषकर वर्तमान बुश प्रशासन की तानाशाही व उपसाम्राज्यवादी नीतियों के विरुद्घ हैं इसलिए पाकिस्तान में मुशर्रफ विरोधी राजनीतिज्ञ विशेषकर नवाज शरीफ जैसे नेता उस अमेरिका विरोधी जनभावनाओं का भी आसानी से लाभ उठाना चाहेंगे।
Nawaz Sharifऐसे हालात में जबकि पाकिस्तान का राजनैतिक भविष्य अंधेरे में लटका नजर आ रहा है, सबसे बडी चिंता का विषय जहां यह है कि पाकिस्तान में मौजूद परमाणु हथियार गलत लोगों के नियंत्रण में न जाने पाएं वहीं इस बात का भी अंदेशा बना हुआ है कि जनरल मुशर्रफ के सत्ता से हटने के बाद कहीं जेहादियों के समर्थन की सरकार पाकिस्तान की सत्ता पर काबिज न हो जाए। जैसा कि नवाज शरीफ की पाकिस्तान वापसी की असफल कोशिश तथा उनके समर्थन में उतरे जमात जैसे संगठन की सक्रियता को देखने से प्रतीत हो रहा है।
  बहरहाल पाकिस्तान व पडोसी देशों और कहना गलत नहीं होगा कि इस्लामी जगत का भी कल्याण इसी में है कि पाकिस्तान रूढिवादियों, जेहादियों तथा इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाले तालिबानी विचारधारा के लोगों से पाक व साफ रहे। पाकिस्तान को आतंकवाद मुक्त रखने तथा एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र के रूप में कायम रखने की दिशा में जो भी राजनैतिक पक्ष अपनी रचनात्मक भूमिका निभा सके भले ही वह कोई सैन्य शासक ही क्यों न हो, उसी को सत्ता में रहना चाहिए। यदि नवाज शरीफ ने कट्टरपंथियों के कंधों पर सवार होकर जनरल मुशर्रफ को हटाने तथा स्वयं सत्ता पर अधिकार जमाने की कोशिश की तो यह पाकिस्तान के हित में हरगिज नहीं होगा।


तनवीर जाफरी(सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी) 
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