Tuesday, 26 January 2021

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सुलगता जम्मू-कश्मीरः जिम्मेदार कौन?


तनवीर जाफरी, (सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी)

भारत के सीमान्त राज्य जम्मू-कश्मीर का जम्मू क्षेत्र स्वतंत्र भारत के इतिहास में गत् दिनों पहली बार एक बडे जन आन्दोलन के परिणामस्वरूप धधक उठा। कारण था जम्मू-कश्मीर राज्य सरकार द्वारा हिन्दू धर्म के अति पवित्र स्थल एवं प्रमुख तीर्थ स्थान अमरनाथ के यात्रियों की सुविधा हेतु अमरनाथ श्राईन बोर्ड को आबंटित की जाने वाली जंगल की वह लावारिस भूमि जिसका कुल क्षेत्र 1 फुटबॉल के मैदान के बराबर भी नहीं, को पहले अमरनाथ श्राईन बोर्ड को आबंटित करना तथा बाद में राज्य सरकार द्वारा इसी जमीन का वापस लिया जाना। यदि पहली नजर में इस मुद्दे पर निष्पक्ष रूप से नजर डाली जाए तो यह मुद्दा कोई ऐसा मुद्दा भी प्रतीत नहीं होता जिसे कि अखबार की साधारण सी खबर तक बनाया जा सके। परन्तु इसी अति साधारण से दिखाई देने वाले मुद्दे ने इतना तीव्र रुख अख्तियार कर लिया है कि कहीं देश में साम्प्रदायिक उन्माद भडकने की चिंता जाहिर की जाने लगी है तो कहीं गृह युद्घ जैसे कयास लगाए जाने लगे हैं। कुछ राजनैतिक दल इस मुद्दे को सत्ता की सीढी के रूप में देख रहे हैं। परन्तु जम्मू-कश्मीर सहित पूरे देश का धर्म निरपेक्ष एवं उदारवादी व्यक्ति हतप्रभ होकर साम्प्रदायिकतावादी एवं अलगाववादी सोच रखने वाले नेताओं के इन हथकंडों को बडे गौर से बेबस और लाचार होकर देख रहा है।

आईए, इस मामूली सी जमीन पर करते हैं एक सरसरी दृष्टिपात। जैसा कि सर्वविदित है कि भारतवर्ष 2020 के विकसित राष्ट्र बनने के अपने लक्ष्य पर तेजी से आगे बढ रहा है। विकास के तथा आर्थिक उन्नति के सभी क्षेत्रों की पहचान कर उनका आधुनिकीकरण किया जा रहा है। पर्यटन के क्षेत्र में भी देश काफी तरक्की कर रहा है। जम्मू-कश्मीर में विशेषकर कश्मीर घाटी क्षेत्र में पर्यटन के विकास हेतु अरबों रुपए खर्च किए जा चुके हैं। विकास की इस प्रक्रिया को पूरा करने हेतु पूरे देश में जहां कहीं भी जरूरत महसूस हो रही है, सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण किया जा रहा है। इसी सिलसिले की एक कडी है अमरनाथ श्राईन बोर्ड को जंगल की जमीन का वह मामूली सा टुकडा आबंटित किया जाना जिसपर कि अमरनाथ यात्री यात्रा के केवल 3-4 महीनों के दौरान यहां ठहर सकेंगे अथवा उस जमीन का उपयोग कर सकेंगे। शेष लगभग 9 माह तक वह विवादित जमीन उसी प्रकार खाली पडी रहेगी जैसी कि हमेशा खाली पडी रहती है।

जम्मू-कश्मीर राज्य के पूर्व राज्यपाल एस के सिन्हा द्वारा इस विवादित जमीन को अमरनाथ श्राईन बोर्ड को दिए जाने की राज्य सरकार की सिफारिश पर हस्ताक्षर किए गए थे। कांग्रेस व जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रीय दल पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पी डी पी) की गठबंधन सरकार द्वारा संयुक्त रूप से मंत्रिमंडलीय स्तर पर इस विवादित जमीन को अमरनाथ श्राईन बोर्ड के प्रयोग में लाने हेतु उसे सौंपा गया था। परन्तु बडे ही नाटकीय ढंग से पी डी पी ने पहले तो राज्य सरकार के इस फैसले का समर्थन किया तथा बाद में इस फैसले से अपने कदम पीछे हटाते हुए राज्य सरकार से अपना समर्थन तक वापस ले लिया। इसके पश्चात जम्मू-कश्मीर राज्य में राजनैतिक संकट खडा हो गया। राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। कश्मीर घाटी में कट्टरपंथी एवं अलगाववादी शक्तियों द्वारा इस मामूली से जमीन के टुकडे को अमरनाथ श्राईन बोर्ड से वापस लिए जाने की मांग को लेकर प्रदर्शन शुरु कर दिए गए। परिणामस्वरूप स्थिति बिगडती देखकर जम्मू-कश्मीर के नवनियुक्त राज्यपाल एन एन वोहरा को इस विवादित जमीन को अमरनाथ श्राईन बोर्ड से वापस लिए जाने का दुःखद निर्णय लेना पडा।

फिर क्या था। जिस प्रकार इसी वर्ष अक्तूबर में होने वाले जम्मू-कश्मीर विधानसभा के चुनावों को मद्देनजर रखते हुए पी डी पी द्वारा विवादित जमीन वापस लिए जाने के विरोध का ढोंग रचकर घाटी के मुसलमानों के वोट बैंक को अपना निशाना बनाने का प्रयास किया गया था, उसी प्रकार जम्मू क्षेत्र में भी साम्प्रदायिक शक्तियां सक्रिय हो उठीं। पी डी पी नेता महबूबा मुफ्ती ने यदि इस मामले को राज्य की सत्ता तक पहुंचने का जरिया समझा तो भारतीय जनता पार्टी ने इसे राष्ट्रव्यापी मुद्दा बनाने की कोशिशें तेज कर दीं। भारतीय जनता पार्टी के संरक्षक समझे जाने वाले हिन्दुत्ववादी संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आर एस एस) को जोकि पहले ही जम्मू-कश्मीर राज्य को तीन भागों में विभाजित किए जाने की पैरवी करता रहा है, बैठे-बिठाए एक सुनहरा अवसर हाथ लग गया। जम्मू क्षेत्र में इस मुद्दे को लेकर साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाने की भरपूर कोशिश की गई। कई जगह मुस्लिम बस्तियों व मुस्लिम धर्मस्थलों पर हमले भी किए गए। परन्तु जम्मू के धर्मनिरपेक्ष ढांचे ने साम्प्रदायिकता की इस आंधी को आगे बढने नहीं दिया। जहां साम्प्रदायिकतावादी हिन्दुओं ने जम्मू क्षेत्र की कई मुस्लिम बस्तियों को तबाह करने व अपना निशाना बनाने की कोशिश की, वहीं अधिकांश हिन्दुओं ने उन्हीं मुस्लिम बस्तियों को बचाने का भी कार्य किया।

यहां एक बात काबिलेजिक्र यह है कि न सिर्फ पूरा भारतवर्ष बल्कि पूरी दुनिया जानती है कि अमरनाथ गुफा में अस्तित्व में आने वाले बर्फानी शिवलिंग का दर्शन सर्वप्रथम एक मुस्लिम गूर्जर चरवाहे द्वारा ही किया गया था। इसी मुस्लिम चरवाहे ने अमरनाथ गुफा में शिवलिंग बनने की सूचना सर्वप्रथम हिन्दू धर्मावलम्बियों को दी थी। आज भी उस मुस्लिम गूर्जर परिवार के सदस्य इस अमरनाथ गुफा पर अपना अधिकार रखते हैं। यह गूर्जर परिवार इस पवित्र स्थल के प्रति अपनी गहन आस्था व श्रद्घा भी रखता है। यही वजह है कि जब जम्मू के लोग इस विवादित जमीन को अमरनाथ श्राईन बोर्ड को वापस दिए जाने की अपनी मांग को लेकर सडकों पर उतर आए तथा साम्प्रदायिक शक्तियां इस आंदोलन को साम्प्रदायिकता का जामा पहनाने की कोशिश करने लगीं, उसी बीच जम्मू क्षेत्र का गूर्जर समुदाय भी सडकों पर उतर आया तथा वह भी जम्मूवासियों के सुर से अपना सुर मिलाते हुए इस विवादित जमीन के टुकडे को अमरनाथ श्राईन बोर्ड को वापस दिए जाने की मांग करने लगा।

 

इस विवादित जमीन के मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार सक्रिय हो गई है तथा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस विषय को लेकर एक सर्वदलीय बैठक भी कर चुके हैं। आशा है कि इस मसले का शांतिपूर्ण समाधान यथाशीघ्र निकल भी आएगा। परन्तु देश की जनता को चाहे वह कश्मीर घाटी के मुसलमान हों अथवा शेष भारत के हिन्दू समुदाय के लोग, इन सभी को उन राजनैतिक नेताओं व राजनैतिक दलों के सभी हथकंडों को बडे गौर से समझना व परखना चाहिए। यदि इस मुद्दे को लेकर पी डी पी का निशाना जम्मू-कश्मीर के अक्तूबर में होने वाले चुनाव हैं तो भारतीय जनता पार्टी भी 2009 में होने वाले लोकसभा चुनावों के मद्देनजर ही इस विवादित मुद्दे को राष्ट्रव्यापी हवा दे रही है। परन्तु इस आंदोलन में विशेषकर जम्मू क्षेत्र में सुखद स्थिति उस समय बराबर देखने को मिलती रही जबकि आन्दोलनकारियों द्वारा किसी राजनैतिक दल के झण्डे के बजाए राष्ट्रीय ध्वज को बुलंद करते हुए अपना विरोध प्रदर्शन किया जा रहा था। बेहतर होगा कि कश्मीर घाटी के धर्मनिरपेक्ष व उदारवादी लोग इस विषय पर खुलकर सामने आएं तथा देश के बहुसंख्य उदारवादी हिन्दू समुदाय की धार्मिक भावनाओं का आदर करते हुए यह मामूली सा विवादित हो चुका जमीन का टुकडा देशभर से आने वाले तीर्थ यात्रियों की सुविधा हेतु श्री अमरनाथ श्राईन बोर्ड को बाईज्जत सौंपे जाने की पैरवी करें। सहिष्णुता व सहनशीलता का ऐसा ही व्यवहार देश में हिन्दू-मुस्लिम सद्भाव को आगे बढा सकता है अन्यथा पी डी पी व भारतीय जनता पार्टी जैसी सोच रखने वाले राजनैतिक दल देश के इन दो बडे समुदायों के बीच ऐसे मुद्दों को नफरत फैलाने वाले मुद्दों के रूप में हमेशा इस्तेमाल करते रहेंगे।


 

तनवीर जाफरी - [email protected]