Saturday, 17 April 2021

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नया साल मुबारक


हे सखी ! नया साल प्रारम्भ हो गया है।  मेरा मन काँप रहा है, क्याेंकि नया साल शुरू हो गया है। लोग हैं कि नव वर्ष पर शुभकामनाएँ देते हुए थक नहीं रहे हैं। शुभकामना देने में अपने बाप का जाता भी क्या है? इस तर्ज पर भारतवासी एक-दूसरे को शुभकामनाएं दे रहे हैं। मैंने भी शुभकामनाओं के ढेर सारे रंग-बिरंगे कार्ड मेज पर सजा रखे हैं, ताकि आने वाला देख ले कि भाई लोग मुझे बधाई देने से चूक नहीं रहे हं।

हे सखी ! बीता साल लेखा-जोखा करने को प्रेरित करता है कि हम कितने आगे बढ़े, कि हम कितने पीछे गए। देश ने कई महान उपलब्धियां हासिल की हैं मोटे तौर पर राष्ट्र की तस्वीर कोई निराशाजनक नहीं है, लेकिन महान उपलब्धियां प्राप्त करने के बावजूद आज लोगां के चेहरा पर वो चमक-दमक और खुशी तथा प्रसन्नता नहीं है, जो मुल्क के लोगा पर दिखाई देनी चाहिए।

देश की दोषपूर्ण अर्थव्यवस्था ने सम्पूर्ण राष्ट्र को हिलाकर रख दिया है। महंगाई की मार से सारे देश में त्राहि-त्राहि मची हुई है। आम आदमी के लिए दाल-रोटी खाना भी इतना महंगा हो गया है कि उसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। न जाने आज भी कितने करोड़ लोग भूखे ही सो जाने को विवश हैं। करोड़ों लोगों को दो वक्त का खाना भी नसीब नहीं हो पाता। करोड़ों लोग आज भी नंगे, अधनंगे रहकर अपना जीवन काट रहे हैं। करोड़ों के पास आज भी रहने को अपना घर नहीं। लाखों बच्चे आज भी स्कूल नहीं जा पाते। मरीजों के इलाज का पूरा बन्दोबस्त नहीं है। यह तस्वीर वास्तविक है और इसमें हर कोई अपनी दशा देख सकता है।

Bye Bye 2012 - Welcome 2013 - Happy New Yearहे सखी ! दोषपूर्ण अर्थव्यवस्था के कारण देश के मुट्ठी भर लोग ही मालामाल हो रहे हैं। तो करोड़ों लोग फटेहाल जिन्दगी बसर कर रहे हैं। इससे साफ जाहिर हो रहा है कि आजादी के इतने साला बाद भी देश का आम आदमी खुशहाल नहीं है। वह आम आदमी, जिसके लिए स्वतंत्रता हासिल की गई थी, उसे भी चन्द लोगों ने कैद कर रखा है।

देश के सामाजिक जीवन में इन दिनों एक  नई तिलमिलाहट दिखाई दे रही है। और वह है नारी के साथ बलात्कार। राजधानी दिल्ली में ही नहीं बल्कि सारे देश के महानगरा, शहरा, कस्बा में बलात्कारियों को मृत्युदण्ड देने के लिए मोमबत्ती मार्च की बाढ़ सी आ गई है। आए दिन अखबारा में बलात्कार सुर्खियां पा रहे हैं। घिनौने काण्डा की चर्चाएं हो रही हैं। आज भी भारतीय नारी की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ी है और उसके साथ अनेक प्रकार के अत्याचार हो रहे हैं। दलितों के साथ आज भी अत्याचार बदस्तूर जारी हैं। ऎसा लगता है कि देश में अराजकता अपनी चरम सीमा तक पहुंच गई है। कानून और व्यवस्था चरमरा गई है और इसका कोई हल नहीं निकल पा रहा है।

आखिर देश के इस हालाता के लिए कौन उत्तरदायी है? इसका सीधा सा प्रत्युत्तर है - हमारे राजनेताओं के सिवा कौन हो सकता है, जो अपनी तुच्छ मनोवृत्ति के शिकार होकर देश को रसातल में पहुंचाने में लगे हैं। देश के राजनेता दृष्टिहीन हैं। और वे केवल अपना और अपने भाई-भतीजों का कल्याण करने में ही मस्त और व्यस्त हैं। तबादलों का सवाल हो या किसी की नियुक्ति का, राजनेताओं और शासन चलाने वालों का सारा वक्त इसी उधेड़बुन में बीत जाता है। जनकल्याण की ओर उनका ध्यान जाता ही नहीं, न उन्हें देश की समस्याएं कभी कचोटती हैं। जब नेताओं और शासनकत्र्ताओं का पतन हो जाता है तो फिर देश को गर्त में जाने से कौन बचा सकता है?

हे सखी ! तुम यह शब्द पढ़ते हुए ठीक ही सोच रही हो कि मैं नया कुछ भी नहीं लिख रही हूं क्याें कि नया कुछ होगा भी नहीं। वैसा ही होगा जैसा होता आया है। क्योंकि हम अपनी परम्परा से आगे बढ़ने के इच्छुक ही नहीं हैं। वही नारेबाजी, साम्प्रदायिक दंगे, बंद की अपील, भ्रष्टाचार, लूट, भू्रण हत्या, बलात्कार की घटनाएं हाेंगी। उद्घाटन, भाषण, चाटन और बेकारों की भीड़ का वही प्रतिशत बना रहेगा। भ्रष्टाचार को हटाने के लिए ठोस कदम उठाए जायंगे लेकिन वे कदम जाने किन-किन भारों से इतने भारी हो चले हैं कि शायद ही अब किसी से उठ पाएं। इस प्रकार से हे सखी ! फिर भी यदि जीवन में सुन्दरता बची रह जाए तो मेरी ओर से तुम्हें नया साल बहुत-बहुत मुबारक हो।

अलविदा 2012....स्वागतम् 2013...

 


- अनिता महेचा