Sunday, 26 March 2017

स्वदेश के बहाने राष्ट्रवाद पर चर्चा


देश में चल रही आरक्षण, धर्म, जातीय व्यवस्था और राष्ट्रवाद की उठापटक के बीच आशुतोष गोवारिकर की फिल्म स्वदेश बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेज है, ये निश्चित रूप से सिनेमाई और राष्ट्रीय महत्व का एक भूलाया हुआ प्रसंग है. इसे हमारी संस्कृति और राष्ट्रवाद को गूढ़ता से समझने और जानने के दृष्टिकोण से प्रासंगिक बनाये रखना जरूरी है. रचनात्मक भारतीय फिल्मो की सूची में सिनेमा के पोंगा पंडित प्रायः इसे नजरअंदाज करते है, जबकि इसमें उठाये गए मुद्दे और उसके निवारण की चर्चा तो संजोने और लागू करने लायक है। असली भारत और स्वदेश की अवधारणा को समझने, जानने और बताने का गंभीर प्रयास इससे पहले कभी नही हुआ। इसके विषय की गंभीरता को हर एक भारतीय तक पहुचाने के लिए किताबी पढ़ाई से कही ज्यादा अच्छा हो कि ये फिल्म हर आम और खास को दिखाई जाए। फिल्म वैचारिक स्तर पर छायावाद नही बल्कि तार्किक है, मुखर है। फिल्म में हमारी संस्कृति की गहरी जड़े है, हमारे देश का और हम लोगो का मूल स्वरूप है। इस मूल में ही छिपे रोजमर्रा के छोटे छोटे सुख है और उसी मूल में छिपी हमारी सारी समस्याए है। भारत के अंदर दो भारत है। एक भारत में अपनी परंपरा और मान्यताओ से निरन्तर हो रहे विघटन के बावजूद ढोया हुआ समाजवाद है तो वही दुसरे सिरे पर अंगड़ाई लेता दूसरा भारत है जिसमे अपनी विरासत और ग्लोबोलिजेसन के बीच भविष्य की और निगाहें टिकाये मानव मन है। भारत के महान होने के रटे रटाये दम्भ को नकारता लेकिन उसकी महान हो सकने की जमीनी हकीकत के तर्क देता, प्रौढ़ और छिछली मान्यताओ से दो चार होता, समस्या के निवारण में खुद आगे आता हुवा युवा है। आशुतोष गोवारिकर ने समाज के सबसे उपेक्षित वर्गों और लोगो की समस्या को बिना फिल्मी फण्डेबाजी के सामने रखा। एक ही फिल्म में गाँव के तमाम मीठेपन के बावजूद उससे जुडी बाल विवाह,जातिप्रथा,छुआछुत, लिंगभेद,अशिक्षा जैसे गंभीर सामजिक मुद्दो को,उसकी गंभीर कड़वी हकीकत के साथ सामने रखा है। गाँव के दलित, शोषित, कुम्हार, जुलाहा, खेतीहर की पीड़ा है, उसके समाधान की कसरत है। एक गरीब जुलाहा जो काम ना मिलने पर अपने बच्चों का पेट पालने के लिए अपना जुलाहा कर्म छोडकर खेती करनी चाहता है पर उसको अपना काम बदलने पर बिरादरी से निष्कासित होना पड़ता है। अपने लड़को की पढ़ाई के लिए तो सजग सरपंच घर की लड़कियो को आगे पढ़ने नही देता क्योंकि उसे आगे चौका चूल्हा सम्भालना है। पढ़ाई की उम्र में स्टेशन पर चार चार आने में पानी बेचती हमारे देश की मासूमियत है। ऐसे बहुत से प्रसंग है जो हमारे देश की कड़वी सच्चाई है पर इस सच्चाई को संडास की तरह या सिनेमाई मुहावरो की तरह नही दिखाया है बल्कि समाजसुधार के कार्यक्रम की तरह विचारणीय खुला रखा है। आशुतोष की लगान का गाँव जहा कहानी में अपने गद्य स्वरूप में था वही स्वदेश का गाँव कहानी में काव्य की लोच जैसा है। गाँव की पंचायत, स्कूल,डाक घर, पोखर, मंदिर,कुश्ती का अखाडा, रामलीला,मोहल्ला सिनेमा,बुजर्गो के सानिध्य का आनंद, चौपाल, दोपहर की खाट की नींद,घर आँगन, बिजली का आना जाना, चौपाल के भजन,दाई की मालिश जैसे ग्रामीण जीवन के सभी कुछ देखे, सुने और भोगे हुए को आशुतोष ने कहानी में पिरोया है। प्रसंगों में छोटी छोटी बाते है और बातो में रोज के मुद्दे है। फिल्म की ख़ूबसूरती ये भी है कि ये केवल समस्या नही उठाती बल्कि उसके निवारण के उपाय भी ढूंढती है। फिल्म की नायिका गीता के रोल की डिजायनिंग भी असली नारीवाद है। विरासत संजोये, दिल्ली में पढ़ी पर गाँव में बच्चों को पढ़ाने का जूनून लिए गीता,जो मुखर होकर होने वाले पति और उसके माँ बाप से कहती है कि लड़की के हाथ केवल मेहंदी लगाने के लिए नही होते। घर चलाने में पुरुष की भी उतनी ही ज़िम्मेदारी होती है जितनी महिला की। गायत्री जोशी नाम की इस हीरोइन की ये एक और एकमात्र फिल्म है। शायद फिल्म का नारीवाद जीवन में चल ना पाया। फिल्म की वन लाइनर में कई महत्वपूर्ण बातो को कहा गया है। प्रतिभा पलायन को तो एक डाइलॉग में ही लाजवाब व्यक्त किया गया है- चौखट का दिया एंड गिविंग लाइट तो नेबर'स हाउस। विदेश वापिस जा रहे मोहन भार्गव को रोकने के लिए अंतिम प्रयास के रूप में देश की मिटटी, तुलसी, मसाले का ठेठ देसी और अनोखा सिनेमाई प्रयोग जब आशुतोष करते है तो इन दिनों के कुछ निर्देशको के सनसनी सिनेमा के बिना लॉजिक के प्रयोग लगभग शरमाते हुए दिखते है। फिल्म के हर तकनीकी पक्ष की तरह ही रहमान का संगीत बेहतरीन है। संगीत और उसका व्याकरण देशज है। थीम म्यूजिक में माउथ ऑर्गन जैसे कोई वाद्य और ये तो देश है तेरा गीत में रहमान की शहनाई को किसी शब्द या गायक की जैसे जरूर

त ही नही। रहमान 90 के दशक के फिल्म उधोग के लगभग रचनात्मक दिवालियेपन के बीच चमत्कार सा आये है।जावेद अख्तर के लिखे सभी गीत अच्छे है पर रामलीला के रावण मरण के दृश्य में लिखी उनकी पंक्तिया बहुत ही असरदार और प्रासंगिक है- 'राम ही तो करुणा में है, शांति में राम है राम ही है एकता में, प्रगति में राम है राम बस भक्तो नही, शत्रु की चिंतन में है देख तज के पाप रावण, राम तेरे मन में है राम तेरे मन में है, राम मेरे मन में है राम तो घर घर में है, राम हर आँगन में है मन से रावण जो निकाले, राम उसके मन में है। नसीरूदीन शाह ने एक बार कहा था कि अच्छे अभिनेता का आंकलन उसकी चुनी हुई फिल्मो से भी होता है। इस रूप में नसीर, अजय देवगण और आमिर खान जैसे अभिनेताओ के हिस्से में खजाना है और शाहरुख़ के हिस्से में केवल स्वदेश और चक दे इण्डिया ही है।

                                                                             नवल किशोर व्यास