Saturday, 29 April 2017

सोशियल मीडिया के सहारे चल रहा है प्रचार युद्ध


निकाय चुनाव को लेकर चुनावी प्रत्याशियों मे अपने अपने वार्ड के सभी घरों मे कम से कम एक बार चेहरा दिखाने की होड़ मची हुई है।  लेकिन चुनाव आयोग भी ना! बस जादू समझता है चुनाव लड़ने को, सोचता है कि दस दिन मे हजारों घरों मे हाजिरी लगाना आसान है! बाप रे!  इनके नियमों के हिसाब मे तो घर पर बैठ जाओ, ना झण्डे, ना बैनर, ना दीवार लेखन, ना जगह - जगह कार्यालय, ना बड़े अखबारों के महंगे विज्ञापन, भौंपू वाली टैक्सीयां व  गीत-संगीत भी नही, सार्वजनिक कार्यक्रमों मे अपील इत्यादि सब पर पाबंदी!  अरे नेता चुनना है या आइएएस की परीक्षा देनी है कि घर बैठ कर तैयारी करो!

 

लेकिन भईया भगवान के घर देर है अन्धेर नही। इन चुनावी प्रत्याशियों के लिए उपरवाले ने एक बेहद सस्ता, सुन्दर , टिकाऊ, और तो और वैरी वैरी पर्सनल सा दरवाजा खोल दिया है।
 
अब नाते रिश्ते वाले या फिर यार दोस्त मिलते है तो कहते है कि आपके सारी एक्टिीवीटी, विचार, फोटो, वीडियों आदि फेसबुक / वाट्सएप पर देखते हुए अपडेट रहता हुॅु, इसलिए आपसे दूर होने का एहसास ही नही होता है। तो भईया चुनावी बयारं भी इससे कैसे अछुती रहे! बस हमारे गली मौहल्ले के सभी नेता भी उपरवाले को धन्यवाद देते हुए जोर शोर से चल पड़े है इसी दरवाजे से चुनाव प्रचार करने।
 
फेसबुक/वाट्सएप को बेकार, टाइम किलर और ना जाने कैसे कैसे बुरा बतलाने वाले पारंपरिक सोच वाले लोगो ने भी मोबाईल के जरिए फेसबुक/वाट्सएप से राजनैतिक दावं पेच के तहत गले लगा लिया है।  फेसबुक और वाट्सएप वाले फोन खरीद लिये है और हां डाटा पैकेज भी।  नेताओं ने वाट्सएप पर प्रचार करने के लिए वार्ड वाइज मोबाइल लिस्ट अपनी नातिन और पोते पोतीयों को सौंप दी है।
 
प्रत्याशियों के सपोर्ट्रों ने भी इन्टरनेट वाले कम्प्युटर की कुर्सीयां सम्भाल ली है। टैब और स्मार्ट फोन धारक रिश्तेदारों ने भीे 1जीबी का, किसी ने 2जीबी के प्लान ले लिये है और भतीजे, भांजो ने तो 24 घंन्टे ड्यटी देने के भरोसे अनलीमीटेड पैकेज लिये है। बस अब ये जी जान से लग गये है इस चुनावी बैतरणी को पार करने के लिये। 
 
स्ट्रेटेजी के तौर पर इन आईटी चुनावी प्रचार योद्धाओं ने प्राथमिक स्तर पहले परिचय, और संम्भावित उम्मीदवार के बैनर सैकड़ो लोगो को टैग करते हुए अपनी वाॅल पर चस्पा किये है। और अब पार्टी का टिकट मिलते ही नये डिजाईन्स के साथ वादे, योग्यता और पारिवारिक योग्यता बताते बैनर लगा दिये है। फेसबुक के बाद फिर इन्ही बैनर्स को धड़ाधड़ वाॅट्सप पर टिकाये जा रहे है।  और तो और वाॅट्सएप पर वार्ड वाईज ग्रुप बनाये जा रहे है और उनमे प्रचार अभियान चलाया जा रहा है।
 
Use of FaceBook Whatsapp in Local Bodies Election
 
सर्पोटर्रो ने द्वितीय फेज के तहत फेसबुक ग्रुप और पेज बनाये है जिसमे वे लगातार प्रत्याशी के घर-गली जनसंपर्क वाले फोटो,  पाटों और बुढ़े बुर्जगों, वार्ड अग्रजों के आर्शीवाद वाली फोटो, पुरानी सामाजिक सरोकारों वाली फोटो,  बड़े नेताओं के पास खड़े वाली फोटो, जोशीले नारांे और वादों वाले बैनर, समाज के अग्रजों से अपील वाली पोस्ट इत्यादी। 
 
प्रचार अभियान के तीसरे फेज के तहत ये योद्धा दूसरों की पोस्ट पर छापामार, खो करने के तरीके से भी कमेंट के रूप मे अपने अपने प्रत्याशी का बैनर और अपील वाले पोस्ट रिप्लाई लगा रहे है जिससे की सामने वाले प्रत्याशी के फ्रेंड लिस्ट मे एक सैंकेड मे प्रचार प्रसार हो जाता है।
 
आज के आधुनिक जमाने मे फोटोशाॅप और मोबाईल की आसान सी ऐप्स के सहारे नये नये डिजाइन आसानी तैयार हो जाती है और किसी विशेषज्ञ डिजाइनर्स की भी ज्यादा जरूरत नही पड़ती है।
 
वार्ड स्तर पर होने वाले इन निकाय चुनावों मे दोनो मुख्य पार्टीयों मे असंतुष्टो की लम्बी खेप के कारण सबसे ज्यादा बागी उम्मीदवार होते है और निर्दलीय भी ज्यादा तो कार्यकत्र्ता - प्रचारक भी, इसलिये ये चुनाव भी इतने ही रोचक हो जाते है।  इन चुनावों मे बीजेपी वाले मोदी पंचारिष्ट से चुनावी सेहत ठीक करने मे लगे है तो काॅग्रेस वालों ने चुप चाप वाली रणनीति अपनाई हुई है।  
 
लेकिन इन सब की मार तो बेचारे उन फेसबुक उपयोगकर्ता पर पड़ रही है जिनको कैन्डी क्रश रिक्वेस्ट ने पहले ही मार रखा है या जिनका कोई नाती रिश्तेदार, यार दोस्त चुनावी प्रत्याशी नही है। मार वाट्सएप के  उन उपयोगकर्ताओं को भी पड़ रही है जो पहले से ही अपने मित्र और रिश्तेदार के दुनिया भर के ज्ञान वाले सन्देशों से दुःखी है। समस्या तब और ज्यादा हो जाती है जब किसी का प्रचार उसके वार्ड से मेल न खाता हो, वार्ड 18 के प्रत्याशी के बैनर के नीचे वार्ड 17 वाला अपना प्रचार करता दिखता है, पूछने पर तुर्रा यह कि यार इसके फ्रेंड लिस्ट वाले भी तो अपने वार्ड के हो सकते है! 
 
हालांकि चुनाव आयोग ने इस माध्यम को भी अपने चुनाव प्रचार प्रसार के हिसाब किताब मे ले  रखा है लेकिन इसका खर्चा कम है तथा सपोर्टर की तरफ से किये गये प्रचार योगदान के आगे हिसाब मे लाचार सा ही दिखता है।  इसलिए स्थानीय सरकार बनवाने के लिए आपको इतनी जहमत तो उठानी पडे़गी चाहे आपकी ये स्थिति हो की अब कहां जाई, का करी . . .