Monday, 18 December 2017

सूचना कानून के दायरे में राजनीतिक दल


-अवधेश कुमार-
केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा देश के छह मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों कांग्रेस, भाजपा, बसपा, भाकपा, माकपा और राकांपा को सूचना अधिकार कानून, के दायरे में लाने के फैसले पर प्रतिक्रिया अपेक्षाओं के अनुरुप ही मिश्रित हैं। इस फैसले के अनुसार इन दलों को सूचना अधिकार कानून के तहत सार्वजनिक संस्थाएं माना जाएगा। आयोग ने इन दलों को न सिर्फ छह सप्ताह में सूचना अधिकारी नियुक्त करने का आदेश दिया है बल्कि पार्टी चंदे के बारे में मांगी गई सूचना भी सार्वजनिक करने का आदेश दिया है। राजनीतिक दलों ने इसे अस्वीकार कर दिया है। हाल के वर्षों में राजनीतिक दलों के खिलाफ हल्ला बोलने वाले एनजीओ सहित सक्रियतावादियों के एक वर्ग ने इसका उत्साहजनक स्वागत किया है। यही स्थिति पूर्व नौकरशाहों एवं पूर्व न्यायविदों की है। इनके अनुसार इस फैसले से राजनीति में पारदर्शिता के नए युग की शुरुआत होगी। उनकी मानें तो इससे राजनीतिक दलों को मिले चंदे एवं व्यय का ब्यौरा आम जनता कभी भी ले सकेगी और यह राजनीतिक भ्रष्टाचार पर अंकुश का आधार बनंेगा। किंतु राजनीतिक दलों से परे भी देश में ऐसे लोग हैं जो इस फैसले से कतई उत्साहित नहीं, बल्कि इसे संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के मूल चरित्र के साथ असंगत भ् बता रहा है। प्रश्न है कि इस फैसले को हमें किस तरह लेना चाहिए?
       चूंकि यह फैसला मुख्य सूचना आयुक्त सत्येन्द्र मिश्र, सूचना आयुक्त अन्नपूर्णा दीक्षित और सूचना आयुक्त एमएल शर्मा की पीठ यानी केंद्रीय सूचना आयोग की पूर्ण पीठ ने सुनाया है, इसलिए इसका महत्व दो मायनों से बढ़ जाता है। एक, अब सूचना आयोग के अंदर इसकी समीक्षा संभव नहीं एवं राजनीतिक दलों को इसके विरुद्ध उच्च न्यायालय का दरवाजा ही खटखटाना पड़ेगा। किंतु पहली नजर में पूर्ण पीठ से संदेश यह निकलता है कि इसके सारे पहलुओं पर उससे कहीं ज्यादा विचार-विमर्श हुआ होगा जितना एकल पीठ कर पाता। इस आधार पर फैसले के समर्थक इसे हर दृष्टि से समुचित एवं संतुलित मानते हैं। जरा यह देखें कि आखिर पीठ द्वारा राजनीतिक दलों को सार्वजनिक संस्था मानने के पीछे का तर्क क्या है? इसका मुख्य आधार दलों को सरकार से मिलने वाली आर्थिक मदद और लोकतंत्र में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। वास्तव में इसके लिए आयोग की पूर्ण पीठ ने तीन प्रमुख विन्दुओं का जिक्र किया है। इसके अनुसार राजनीतिक दल इसलिए हैं सार्वजनिक संस्था, क्योंकि 1-चुनाव आयोग निबंधन के जरिये राजनीतिक दलों को मान्यता देता है, 2- इन्हे केंद्र सरकार द्वारा रियायती दरों पर जमीन, बंगला आवंटित होता है, इन्हें, आयकर में छूट मिलती है, चुनाव के दौरान आकाशवाणी और दूरदर्शन पर प्रचार के लिए मुफ्त एयर टाइम आवंटित होता है, कई प्रकार के अन्य प्रत्यक्ष और परोक्ष वित्तीय मदद मिलती है एवं 3-राजनीतिक दल जनता का काम करते हैं। पीठ ने कहा है कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों की भूमिका और उनका कामकाज व चरित्र भी उन्हें सूचना अधिकार कानून के दायरे में लाते हैं। संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों में भी उनका चरित्र सार्वजनिक संस्थाओं का है। इसके अनुसार सूचना अधिकार कानून की धारा 2 एच, में इन्हें सार्वजनिक संस्थाएं करार दिया गया है। 
       सामान्यत तौर पर विचार करने से यह तर्क बिल्कुल सही लगता हैं कि दल आधारित संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में दलों की सारी गतिविधियां पारदर्शी हों, कहां से धन आता है, कौन देता है, कहां खर्च होता है, किन पर खर्च होता है... आदि बातें आम जनता के सामने होनी चाहिए। आखिर उनकी मूल भूमिका जनता की सेवा करने की है तो फिर जनता को उनकी सारी गतिविधियों का पता होना चाहिए। इस आधार पर आयोग द्वारा इन राजनीतिक दलों के अध्यक्षों और महासचिवों को छह सप्ताह में अपने मुख्यालयों में केंद्रीय जन सूचना अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश भी उचित लगेगा। फैसले के अनुसार ये अधिकारी चार सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ताओं की आरटीआइ अर्जियों का जवाब देंगे। आयोग ने इन दलों को सूचना अधिकार कानून की धारा 41,बी, के तहत अपने बारे में ब्यौरा आम करने का भी निर्देश दिया है, इसलिए वैसे भी यह जनता को देखने के लिए हर समय उपलब्ध रहेगा। इस व्यवस्था में यह आरोप हमेशा लगता रहा है कि राजनीतिक दलोें को चंदा देने वाले कारोबारी, पूंजीपति कई प्रकार से इसका लाभ पाने की कोशिश करते हैं। इतिहास में भी इसके प्रमाण हैं एवं प्रत्यक्ष प्रमाण न हों तो भी सत्ता के गलियारों पर नजर रखने वालों को ऐसी दुरभिसंधि की गंध मिलती रहती है। इसके बाद किसी परियोजना, ठेके, विधान आदि और चंदे के बीच संबध जोड़ना ज्यादा आसान हो सकता है।
        एक बार इस फैसले के लागू हो जाने के बाद यह इन दलों तक ही यह सीमित नहीं रह सकता। राज्य के सूचना आयोग इसको आधार बनाकर अपने यहां के मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को भी सार्वजनिक संस्था करार देकर सूचना अधिकार कानून के दायरे में लाएंगे। उनका तर्क होगा कि इन्हें राज्य सरकार से मदद मिलती है, इसलिए ये सार्वजनिक संस्था हैं। इस तरह सारे मान्यता प्राप्त दल सूचना अधिकार कानून की परिधि में आ जाएंगे। इस तरह राज्यों के क्षेत्रीय दलों की ऐसी दुरभिसंधियां भी सामने आ सकतीं हैं। चूकि शीर्ष भ्रष्टाचार एवं राजनीतिक दलों के क्षरण के कारण उनके विरुद्ध माहौल बन रहा है, इस कारण उन पर अंकुश लगाने के किसी कदम का तुरत समर्थन मिलने लगता है। यही इस मामले में हुआ है। हम न भूलंे कि तत्काल फैसले से प्रभावित होने वाली पार्टियां कांग्रेस, भाजपा, माकपा, भाकपा, राकांपा और बसपा ने इसे अस्वीकार करने का संकेत दिया है, इसलिए यह साफ है कि ये उच्च न्यायालय जाएंगे। यानी इस फैसले का क्रियान्वयन अब उच्च न्यायालय और आवश्यकता हुई तो उसके बाद उच्चतम न्यायालय के फैसले पर निर्भर करेगा। न्यायालय चाहे जो भी फैसला दे, हमंे ऐसे मामलों पर उफान में बहने या बनाए गए माहौल में विचार करने की जगह विवेक एवं संतुलन से विचार करना चाहिए। 
       वास्तव में जो कुछ हमारे सामने आ रहा है वह पूरे मामले का एक पक्ष है जिसमें कुछ वजन है। पर सूचना आयोग ने अपने विश्लेषण और दृष्टिकोण के अनुसार यह फैसला दिया है। वह बिल्कुल सही हो और राजनीतिक दलों की अवधारणा का भी उसके ध्यानर रखा गया हो आवश्यक नहीं। हमारे विचार की मुख्य कसौटी यह होनी चाहिए कि आखिर संसदीय लोकतंत्र में दलो की मूल भूमिका क्या है और उसके अनुसार उनका स्वरुप कैसा होना चाहिए? राजनीतिक दलों की मूल भूमिका जन सेवा की ही है। नेता यानी जनसेवक। दल इस लोकतंत्र की रीढ़ ही नहीं, उसकी प्राणवायु, ह्दय, रक्त संचार प्रणाली एवं मस्तिष्क भी हैं। लोकतंत्र का भविष्य ही नहीं, देश की नियति का मुख्य निर्धारक भी राजनीतिक दल ही हैं। जाहिर है, सत्ता में उनकी भूमिका संचालक और पूरे तंत्र के मार्गनिर्देशक और प्रेरणा स्रोत की है तो विपक्ष में सत्ताधारी दल पर अंकुश रखने, जनहित के मुद्दे सामने लाकर उसके पक्ष में नीतियां बनवाने के लिए दबाव डालने, मुद्दों पर जन जागरण करने, जन विरोधी नीतियों पर जनता को आंदोलित करने ...यानी कुल मिलाकर लोकतंत्र एवं पूरी व्यवस्था को ही नहीं समाज को जीवंत, जागरुक और सक्रिय बनाए रखने का दायित्व दलों का ही है। उन्हें कार्यालयों के लिए जगह, चंदे की छूट आदि उनकी मूल भूमिका और उनके चरित्र के कारण मिलीी है। यदि उन्हें जगह नहीं मिलेगी,  प्रचार के लिए सूचना माध्यमों पर समय नहीं मिलेगा तो फिर राजनीतिक गतिविधयां ही नहीं होंगी। हां,  दलों को शुद्ध होना, विचारवान होना, नेताओं का ईमानदारी, जनता के प्रति निष्ठावान तथा मुद्दों का गहरा जानकार होना चाहिए। यही बात दलों के आम कार्यकर्ताओं पर भी लागू होता है। साफ है मूल रुप में दलों को ऐसा उन्मुक्त और हर दृष्टि से स्वतंत्र वातावरण मिल सके ताकि वे कार्यकर्ता निर्माण से लेकर नेतृत्व विकास, जागरुकता एवं आंदोलन अभियान आदि चलाते रहें। यही उनको सरकारी मदद और सुविधाओं के पीछे की सोच है। 
       यदि दलों का क्षरण हुआ है, वे अपनी मूल भूमिका से च्युत हुए हैं, नेता और कार्यकर्ताओं की ईमानदारी और प्रेरक शक्ति कमजोर हुई है तो उसमे सुधार और परिवर्तन राजनीतिक दलों के अंदर से ही हो सकता है। अनावश्यक कानूनों और बंदिशों से आप उसकी स्वाभाविकता, मूल चरित्र और उस अवधारणा का ही गला घोंट देंगे जिसके तहत इनका आविर्भाव हुआ। और फिर यह लोकतंत्र के भविष्य के लिए ही आघात होगा। राजनीति में सुधार आम एकाश्मवादी प्रशासनिक तरीके से नहीं हो सकता। इससे तो राजनतीति के तेवर, उसकी धार ही स्थायी रुप से कुंद हो जाएगी। वैसे भी चुनाव आयोग पहले ही दलों को आयकर रिटर्न भरने तथा आय-व्यय का ब्यौरा आयोग को देने का प्रावधान किया हुआ है। हालांकि कायदे से तो इसकी भी आवश्यकता नहीं होनी चाहिए थी। दलों और नेताओं के प्रति लोगों का इतना विश्वास और श्रद्धा हो कि आम लोग यह सोचे ही नहीं कि वे गलत तरीके से धन लेते होंगे, गलत खर्च करते होंगे या दल के लिए मिले धन का निजी हित में उपयोग करते होंगे, दाताओं को उपकृत करते होंगे। यह आदर्श स्थिति नहीं है तो इसके लिए राजनीतिक संघर्ष, अभियान और आंदोलन की आवश्यकता है, न कि सरकारी संस्था के अंकुश की। वैसे भी इस समय दलों के पतन उन्हें एक दूसरे का प्रतिस्पर्धी की जगह दुश्मन सदृश बना दिया है कि विरोधी आरटीआइ आवेदन की भरमार कर देंगे। तथाकथ्ज्ञित सक्रियतावादी भी अपनी का्रंतिकारिता और समाज में महत्व साबित करने के लिए ऐसा करेंगे। निस्संदेह,, दुरुपयोग की आशंका से किसी कानून के लागू होने और न होने का निर्णय नहीं हो सकता, लेकिन राजनीतिक दलों को सरकारी संस्था मानकर व्यवहार करना तो उसकी मूल कल्पना के ही विरुद्ध हैं। इससे राजनीतिक आंदोलनों, अच्छे कार्यकर्ता व नेतृत्व निर्माण की धारा कमजोर हो जाएगी एव दल केवल औपचारिक सरकारी संस्था बनकर रह सकते हैं।