Tuesday, 26 January 2021

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सभ्यताओं के संघर्ष की अवधारणा पर क्या विराम लगा सकेंगे ओबामा


तनवीर जाफरी, (सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी)

‘नेतृत्व का नया सवेरा हो रहा है......जो संसार को ध्वस्त करना चाहते हैं, मैं उनसे कहता हूं कि हम उन्हें हरा देंगे......जो सुरक्षा चाहते हैं, हम उनकी सहायता करेंगे........अमेरिका के हथियार उसे महान नहीं बनाते बल्कि महान बनाते हैं उसके आदर्श, लोकतंत्र तथा इन पर आधारित उम्मीदें।’ यह थे अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा के भाषण के वे प्रमुख अंश जो उन्होंने अपने चुनाव प्रचार के दौरान दिए। ओबामा के भाषण के इन्हीं अंशों ने अमेरिकी मतदाताओं को यह सोचने प विवश कर दिया कि वास्तव में गत् 8 वर्षों के जॉर्ज डब्ल्यु बुश के निरंकुश शासन के दौरान अमेरिका की कितनी बदनामी हुई है तथा आज अमेरिका को क्योंकर पूरा विश्व नफरत, भय तथा एक अविश्वस्नीय राष्ट्र के रूप में देख रहा है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने आर्थिक मंदी का ऐसा दौर भी आज तक पहले कभी नहीं देखा। भारतीय स्वतंत्रता के प्रणेता महात्मा गांधी तथा रंगभेद विरोधी नेता मार्टिन लूथर किंग के आदर्शों पर चलते हुए 47 वर्षीय बराक ओबामा पहले अश्वेत अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित हो चुके हैं। अमेरिकी इतिहास में 44वें राष्ट्रपति के इस चुनाव प्रचार को अब तक का सबसे खर्चीला व निराला चुनाव भी माना जा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक इसपर लगभग 2.4 अरब डॉलर खर्च हुए हैं।

निःसन्देह 5 नवम्बर 2008 विश्व के इतिहास का एक ऐसा दिन था जिसे संसार कभी भुला नहीं पाएगा। सदियों से समानता की आस लगाए बैठे अश्वेत समुदाय के ओबामा को अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित कर अमेरिकी जनता ने यह साबित कर दिया कि रंग-मूल-भेद तथा दासता जैसी परिकल्पनाएं अब इतिहास के पन्नों में समा चुकी हैं। बराक ओबामा का ह्वाईट हुाउस में प्रवेश निःसन्देह एक ऐसी ऐतिहासिक घटना है जिसकी सदियों से गुलामी के बोझ तले दबे रहने वाले अश्वेतों द्वारा प्रतीक्षा की जा रही थी। ओबामा की जीत को विभिन्न पहलुओं से देखा जा रहा है। इसे वास्तविक अमेरिकी लोकतंत्र की जीत की संज्ञा भी दी जा रही है। यह भी कहा जा रहा है कि यह रिपब्लिकन पार्टी की हार है तथा डेमोक्रेट्स की जीत है। कुछ विश्लेषक इसे ओबामा द्वारा अपने चुनाव अभियान के दौरान किए गए ‘बदलाव’ के वादे को मुख्य कारण मान रहे हैं। परन्तु वास्तविकता यह है कि वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के कार्यकाल के दौरान अमेरिका की दागदार होती छवि विशेषकर इराक व अफगानिस्तान में अमेरिका द्वारा किया गया सैन्य हस्तक्षेप तथा अमेरिका में आई भयंकर आर्थिक मंदी भी ओबामा की जीत का प्रमुख कारण बना।

हालांकि रिपब्लिकन पार्टी के प्रचारकों द्वारा अमेरिकी जनता को यह समझाने का भरसक प्रयास किया गया कि बराक ओबामा के हाथों में अमेरिका सुरक्षित नहीं हैं। इसका कारण जहां उनका कीनियाई मूल का अश्वेत होना प्रचारित किया जा रहा था, वहां यह भी बताया जा रहा था कि वे एक मुस्लिम पिता की संतान हैं। यह सत्य भी है कि ओबामा के पिता नयानगौम कोगेल कीनिया के अश्वेत मुस्लिम थे। ओबामा का जन्म होनोलूलू (हवाई) में हुआ था। जब ओबामा मात्र दो वर्ष के थे तब इनके माता पिता के मध्य तलाक हो गया। उसके पश्चात उनकी माता ने इंडोनेशिया के एक अन्य मुस्लिम लोलो स्वेटरो से दूसरा विवाह रचाया। बताया जाता है कि ओबामा की प्रारम्भिक शिक्षा जकार्ता के मदरसे में हुई। परन्तु उसके साथ-साथ उन्होंने कैथौलिक स्कूल में भी प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की। परन्तु इस पारिवारिक पृष्ठभूमि के बावजूद ओबामा पर रंग-भेद-मूल व जाति धर्म जैसे संकुचित बंधनों का प्रभाव हरगिज नहीं रहा। उनकी मां श्वेत थीं तथा पिता अश्वेत इसलिए वे श्वेत व अश्वेत के मध्य सभी भेदभाव को मिटा देने के पक्षधर थे। वे हमेशा ही विश्व शांति, सद्भाव तथा आपसी भाईचारे के पक्षधर रहे।

जॉर्ज बुश के गत् आठ वर्षों के कार्यकाल में तमाम इस्लामी देशों तथा अमेरिका के मध्य संदेहपूर्ण व तनावपूर्ण होते रिश्तों को लेकर दुनिया को यह संदेह होने लगा था कि कहीं यह दो सभ्यताओं के मध्य   संघर्ष की शुरुआत तो नहीं? खासतौर पर जब कुछ पश्चिमी देशों द्वारा इस्लामिक आस्थाओं पर कार्टूनों तथा लेखों द्वारा इस्लाम को प्रहार किया जाने लगा, उस समय सभ्यता के संघर्ष की इस अवधारणा को और अधिक बल मिला। परन्तु इसी घमासान के मध्य बराक हुसैन ओबामा को विश्व के सबसे शक्तिशाली देश द्वारा अपना राष्ट्रपति चुनकर यह प्रमाणित कर दिया गया कि सभ्यता के संघर्ष की बातें करना राजनैतिक विश्लेषकों की एक कोरी कल्पना मात्र है। यहां एक और तथ्य उल्लेखनीय है कि बेशक अमेरिकी इतिहास की यह पहली घटना है जबकि किसी कीनियाई मूल के अश्वेत अफ्रीकी अमेरिकी को अमेरिका का राष्ट्रपति चुना गया हो। परन्तु भारतीय मूल के कई लोग अपनी उदारवादिता, अपनी ईमानदारी, वफादारी तथा संघर्ष के बल पर कई छोटे-छोटे देशों के सर्वोच्च पदों को सुशोभित कर चुके हैं। मॉरिशस में काफी लम्बे समय से लगातार भारतीय मूल के नेता प्रधानमंत्री का पद संभालते आए हैं। भारत के हरियाणा राज्य से जुडे महेन्द्र चौधरी 1987 में पहले फीजी के राष्ट्रपति बने तथा बाद में इन्हीं ने प्रधानमंत्री का पद भी संभाला। कैरेबियन राष्ट्र त्रिनिदाद एवं टोबैगो में प्रधानमंत्री तथा राष्ट्रपति दोनों ही पदों पर भारतीय मूल के नेता आसीन हो चुके हैं। नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन अधिकारी भारतीय मूल के ही थे। वर्तमान नेपाली राष्ट्रपति डॉ राम बरन यादव भी भारतीय मूल के हैं। राष्ट्रकुल के सचिव रह चुके श्रीदत्त रामफल भारतीय मूल के थे। मजे की बात तो यह है कि रामफल को ग्याना की ओर से इस अति महत्वपूर्ण पद के लिए स्वयं ग्यानावासियों द्वारा ही प्रस्तुत किया गया था। दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मूल की महिला को लोकसभा का अध्यक्ष चुना जा चुका है। वहां आज भी कई मंत्री भारतीय मूल के हैं। ग्याना के ही प्रधानमंत्री रह चुके छेदी जगन भारतीय मूल के थे। उनकी मृत्यु के पश्चात ग्यानावासियों ने उनकी पत्नी जैनेथ जगन को अपना प्रधानमंत्री बनाया। जैनेथ जगन मूल रूप से गोरी अंग्रेज महिला थीं।

इसी प्रकार अर्जेंटीना के राष्ट्रपति रहे कार्लोस बेनम सीरियाई मूल के थे। पेरु के राष्ट्रपति पद पर जापानी मूल के अलबर्टो फूजियोरो आसीन हो चुके हैं। यदि मुस्लिम मूल के व्यक्ति द्वारा ईसाई बाहुल्य देश के राष्ट्रपति चुनने की बात की जाए तो भी अमेरिका भारत से पीछे ही माना जाएगा। भारत में दशकों पूर्व मुस्लिम राष्ट्रपति निर्वाचित हो चुके हैं। भारत में सिख राष्ट्रपति भी रह चुके हैं। वर्तमान में भी भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अल्पसंख्यक सिख समुदाय से सम्बद्घ हैं। और तो और भारतीय संसद इटली मूल की सोनिया गांधी को अपना संसदीय दल का नेता चुनकर प्रधानमंत्री पद भी उन्हें सौंपने जा रही थी परन्तु सोनिया गांधी ने स्वयं इस पद को स्वीकार करने से इंकार कर दिया। अतः ‘परिवर्तन’ की यह लहर अमेरिका से चली है यह तो मैं हरगिज नहीं मानता अलबत्ता इतना जरूर है कि इस परिवर्तन के सूत्रधार होने का सेहरा भारत के ही सिर पर रखा जाना चाहिए। अमेरिका में आए इस परिवर्तन को विश्वस्तरीय रंग भेद एवं जात-पात विरोधी परिवर्तन का चरमोत्कर्ष जरूर कहा जा सकता है।

वैसे तो आम धारणा यही है कि अमेरिका में चाहे रिपब्लिकन सत्तारूढ हो या डेमोक्रेट, अमेरिकी विदेश नीति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आता। परन्तु ‘परिवर्तन’ के नारे के साथ ओबामा का जीतना दुनिया को यह सोचने के लिए जरूर मजबूर कर रहा है कि आखिर ओबामा दुनिया के समक्ष किस प्रकार के परिवर्तित अमेरिका को पेश करेंगे। ‘आतंकवाद के विरुद्घ युद्घ’ की जो घोषणा जॉर्ज बुश द्वारा अपने पहले कार्यकाल के दौरान की गई थी, उस मिशन को ओबामा किस प्रकार अपने साथ लेकर चलेंगे। इराक व अफगानिस्तान के संबंध में उनकी नीतियां क्या होंगी। पाकिस्तान के अफगानिस्तान सीमा क्षेत्र में बढते जा रहे तालिबानी प्रभाव से वे किस तरह निपटेंगे। कश्मीर मुद्दे पर अमेरिका का क्या रुख होगा तथा ईरान व इजराईल नीति पर उनके क्या विचार होंगे आदि मुद्दे ऐसे हैं जिनपर सारी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। इसके अतिरिक्त अमेरिका सहित वैश्विक आर्थिक मंदी से जूझने के ओबामा के पास क्या उपाय हैं, यह भी अमेरिकी नागरिक सहित पूरा विश्व देखना चाहेगा।

आशा की जानी चाहिए कि 20 जनवरी 2009 को 44वें अमेरिकी राष्ट्रपति का पद संभालने वाला यह पहला अश्वेत नेता पूरे विश्व की उम्मीदों पर खरा उतरेगा। ऐसी भी उम्मीद की जा सकती है कि जॉर्ज बुश की आक्रामक एवं अहंकारी नीतियों से अलग हटकर ओबामा विश्व में अमेरिका की छवि एक उदार एवं संरक्षक व सहयोगी अमेरिका महान के रूप में बना पाने में सफल होंगे। और यह भी कि दुनिया से हथियारों की होड खत्म करने में ओबामा सफल होंगे तथा इसकी शुरुआत अमेरिका से ही कर वे एक महान आदर्श स्थापित करेंगे। आशा है ओबामा का अमेरिका हथियारों की राह पर कम तथा शांतिवार्ता की राह पर अधिक चलेगा। और इन सबके अतिरिक्त ‘सभ्यता के संघर्ष’ की सभी अटकलों व शंकाओं पर विराम लगा पाने में भी वे सफल होंगे।   


तनवीर जाफरी - [email protected]