Wednesday, 02 December 2020

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हिंदी साहित्य का अखाड़ा - भाग 2


DISCLAIMER: इस कहानी में उपयुक्त हुए नाम, संस्थाए, जगह, घटनाएं इत्यादि का उपयोग सिर्फ और सिर्फ कहानी को मनोरंजक बनाने के लिए किया गया है। किसी भी व्यक्ति या संस्था से इनका कोई सम्बन्ध नहीं है, कृपया इस कथा को मुक्त हास्य में ले; पर/और दिल पर न ले !!! कथा में निहित व्यंग्य को समझिये ! धन्यवाद ! 



पागल कुत्ते ने मुझे काटा है 
मुझे उससे बदला लेना है 
पर क्या करे यारो, 
मुझे ऑफिस भी तो जाना है 
बॉस पर गुस्सा बहुत आता है 
पर क्या करे, तनख्वाह तो उसी से लेना है 
दुनिया की ऐसी की तैसी हो जाये
अब मुझे लिखकर जवाब देना है 
मुझे साहित्यकार बन जाना है।”

मैं चुप हुआ, देखा तो बाबू भी चुप था। उसने कहा, “यार कुछ ज्यादा मज़ा नहीं आ रहा है। खैर अभी तो शुरुवात है। तू लिखते रह। और इसे कहीं छपने को भेज दे।“
मैंने उस कविता को शहर के कुछ अखबार और पत्रिकाओ में भेज दिया। सभी ने उसे वापस कर दिया। और मुझे नेक सलाह दी कि मैंने लिखना छोड़ देना चाहिए। एक बन्दे ने यह तक कह दिया कि मैं चाय की दूकान खोल लूं, लेकिन लिखूं नहीं ! 
उसके बाद मैंने कई कविताएं और कहानियाँ लिखी, और कई जगहों पर छपने के लिए भेजी, पर कहीं से कोई जवाब नहीं आया। एक दो बार कुछ संपादको से बात हुई तो उन्होंने बताया कि मेरी कविताएं और कहानियाँ पढना तो छोड़ो, देखने के भी लायक नहीं रहती है। मैं बहुत निराश था। बहुत दुखी था। बाबू भी मेरे दुःख से परेशान था, उसे मुफ्त की चाय और समोसे जो नहीं मिल पाते थे। उसने कुछ लोगो से बाते की और साहित्य जगत के बारे में कुछ जानकारी इकठ्ठा की।
फिर एक दिन रविवार की छुट्ठी थी, वो सुबह सुबह मेरे घर आया, मेरी पत्नी से कहा कि भाभी आपके हाथ का स्वादिष्ट नाश्ता खाए हुए बहुत दिन हो गए है। कुछ बना कर खिलाईए न, भाभी उसकी चापलूसी पर खुश हो गयी और पकोड़े और चाय बनाकर ला दिए, मैंने भी उसकी लगी थाली में हाथ मार लिया। थोड़ी देर बाद बाबू ने धीरे से कहा, “चल तुझे एक महान इंसान से मिलाता हूँ।“
हम दोनों निकल पड़े, वो मुझे शहर के पुराने मोहल्ले के एक पुराने से घर में ले गया, घर के दरवाजे के बाहर लिखा था। “बाबा की कुटिया“। मैंने बाबू से कहा, “अबे ये, इतना बड़ा घर कुटिया है? तो फिर हमारे घर क्या है!” बाबू ने हँसते हुए कहा, “अबे मुरारी, हमारे घर चिड़िया का घोंसला है।” मैं भी हंसने लगा। 
इतने में घर का दरवाजा खुला और एक उम्रदराज बूढ़े आदमी ने बाहर कदम रखा।
उन्होंने बाबू को देखा और मुस्कराया और फिर मेरी ओर देखकर पुछा, “तो ये है वो बकरा”
“बकरा” शब्द सुनकर मुझे बहुत गुस्सा आया, फिर भी वो उम्रदराज थे और बाबू पर मुझे पूरा भरोसा था, इसलिए उन्हें प्रणाम किया और पैर छुए। 
उन्होंने भीतर आने का इशारा किया। 
हमें सामने के कमरे में बिठाया और फिर भीतर गए, थोड़ी देर बाद उन्होंने हमारे लिए कुछ नाश्ता लाया। उन्होंने इशारा किया और बाबू भूखो की तरह नाश्ते पर टूट पड़ा, मैंने कहा, “अबे अभी तो घर पर इतना खा कर आया है। इतनी जल्दी भूख लग गयी?” 
बाबू ने कहा, “अबे भूख का क्या है,कभी तो कहीं भी लग सकती है और कुछ भूख तो आदिम होती है, वो ख़त्म ही नहीं होती।“
ये सुनकर बूढ़े बाबा ने कहा, “जैसे तुम्हारे साहित्यकार बनने की भूख !”
मैंने उनकी ओर गौर से देखा, उनकी उम्र काफी थी, उनका अनुभव भी बहुत ज्यादा था। मुझे उन्होंने अपने पास बिठाया और कहा, “देखो बेटा, मेरा असली नाम तो कुछ और था लेकिन अब सब मुझे लिटरेचर बाबा के नाम से ही जानते है। और मैं तुम जैसे साहित्य के भूखे दुखियारो की मदद करता हूँ इसलिए मेरा नाम लिटरेचर बाबा पड़ गया।”
मैंने उन्हें फिर से प्रणाम किया और कहा, “बाबा मेरी मदद करिए, मेरे लिखे को कोई नहीं पढता है, सभी मेरी कविता और कहानी को रिजेक्ट कर देते है। कुछ करिए।”
लिटरेचर बाबा ने एक गहरी सांस ली और कहा, “बेटा; तुम क्यों अपना सुन्दर सा जीवन इस साहित्य के चक्कर में व्यर्थ करना चाहते हो, यहाँ तुम्हे कोई घास नहीं डालेगा, तुम इस भीड़ में कहीं खोकर रह जाओगे और अपने मन की शान्ति खो दोगे। यहाँ रोज नए झंझट होते है, फसाद होते है, लड़ाई –झगडा तो सुबह शाम होते है, कोई किसी को पसंद नहीं करता है, पुराने साहित्यकार नए साहित्यकार को आगे बढ़ने नहीं देता। तुम्हे आलोचक मार कर ही दम लेंगे। प्रकाशक उन्ही को छापता है, जिनके नाम से कुछ किताबे बिक सके। तुम्हे कोई भी संपादक भाव नहीं देंगा। तुम खुद को साहित्यकार बना कर जी का झंझाल मोल ले रहे हो।”
इतना कहकर वो हांफने लगे। मैंने उठकर उन्हें पानी पिलाया। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और कहा, “बेटा साहित्य की दुनिया कुछ अच्छी नहीं है, ये तुम्हारे भीतर के इंसान को मारकर उसे झूठा, दोगला, चालाक, चतुर, एक दुसरे की टांग खींचने वाला, दुसरो के प्रति बुरा सोचने वाला और सबसे बुरी बात, खुद को श्रेष्ठ साबित करने की दौड़ में शामिल करा देगा”
मैंने कुछ रूककर कहा, ”सारे साहित्यकार तो ऐसे नहीं होते है न”
उन्होंने हंसकर मुझे पुछा, “कितने साहित्यकारों को जानते हो ?”
मैंने कहा, “प्रेमचंद, बाबा नागार्जुन, रांगेय राघव इत्यादि।”
उन्होंने फिर हंसकर कहा, “बेटा मुरारी, ये सब अच्छे लोग तो अब इस धरती पर नहीं है न, इनकी जगह पर दुसरे so called साहित्यकारों ने कब्ज़ा किया हुआ है जो कि अपने आपको इनसे बढकर बतलाते है”
मैं गहरी सोच में पड़ गया !
लिटरेचर बाबा फिर भीतर गए और अपने लिए ड्रिंक्स लेकर आ गए, बाबू ने बड़ी आशा से उन्हें देखा, बाबा ने उसे भी एक पैग बना कर दिया, फिर मुझसे पुछा, “तुम लोंगे?“ मैंने कहा, “मैं पीता नहीं।“ बाबा बड़ी जोर से हँसे, और कहा, “अरे पियेगा नहीं तो साहित्य की दुनिया में जियेगा कैसे? गोष्टियो में जब शामिल होंगा,तो थोडा पीकर “सेट” होना पड़ेंगा न, तब ही कहीं जाकर तो मुंह से आवाज निकलेंगी, दुसरो को नीचे दिखाकर आगे जो बढ़ना होता है न“
मैंने नकारात्मक ढंग से सर हिलाया और कहा, “नहीं जी, नहीं। मैं बिना पिए ही साहित्य की दुनिया में अपना नाम बनाना चाहता हूँ ! और दुसरो को बिना नीचा दिखाए अपने लिखे के बलबूते पर अपना नाम कमाना चाहता हूँ।”
बाबा ये सुनकर थोड़े शांत हो गए, गंभीर हो गए। फिर उन्होंने कहा, “ठीक है मुरारी, तुम एक भले आदमी हो, मैं तुम्हारा गुरु बनने के लिए तैयार हूँ!”
मैंने उनके चरण छु लिए, उन्होंने आशीर्वाद दिया और कहा, “अब सामने बैठो और मैं जो जो कहता हूँ वैसे वैसे करते जाओ !”
उन्होंने कहा, “सबसे पहले तो भैया; अपना नाम बदलो, ये मुरारी नाम नहीं चलेंगा। कुछ और रख लो !”
मैंने कहा “बाबा, अब नाम क्यों बदलू, इसी नाम से पढाई किया है और इसी नाम से शादी भी हुई और अब तो बच्चो के बाप का नाम भी यही है और आप कहते है कि नाम बदल डालो ! बात कुछ जमी नहीं बाबा।”
बाबा ने हँसते हुए कहा, “साहित्य की दुनिया में कुछ फैंसी नाम चाहिए कुछ नया, जो मन को अच्छा लगे। सुनने- पढने में अच्छा लगे।” फिर उन्होंने कुछ सोचा और कहा, “अच्छा मुरारी के बदले में कृष्ण रख लो, एक ही तो बात है, कोई पूछे तो कह देना कि उपनाम है। ठीक है?”
मैंने थोड़ी देर सोचा और कहा, ‘ठीक है जी।”
फिर बाबा ने एक घूँट और लिया, बाबू ने एक और पैग ले लिया था और बारबार हर बात पर हंस देता था और मेरी ओर इशारे करके ठहाका लगाकर और जोर से हंसता था, मैं उसे घूर कर देखता था। 
बाबा ने कहा, “मुझे अपनी कविताये या कहानी दिखलाओ”
मैंने निकाल कर दिया, मेरा कागजो से भरा झोला तो हमेशा साथ में ही रहता था। 
बाबा ने पढ़ा और कहा, “ये क्या लिखा है यार, कुछ ढंग का तो लिखो। ये कोई कविता है? कहानी ऐसे लिखते है? बोलो? ये कुत्ते वाली कविता।।।।।।।ये कोई कविता है बोलो? कचरा लिख कर रखे हो।”
मैं रोने लगा। बाबा थोड़े विचलित हो गए, बाबू भी रोने लगा [ वो नशे में ही रो रहा था, पर मेरा साथ तो दे रहा था ] बाबा ने कहा, “अरे तुम दोनों चुप हो जाओ रे।”
मैं सुबक रहा था, उन्होंने मुझे चुप कराया। फिर उन्होंने कहा, “क्या तुम इन सब से बेहतर लिख सकते हो?”
मैंने कहा, “हां ! जी हां।”
बाबा ने कहा, “तो फिर लिखो और पत्रिकाओ को भेजो, फिर देखते है।”
मैंने उन्हें प्रणाम किया और बाबू को लेकर बाहर आया।
अब मुझमे एक नया जोश था, मैंने लिख कर भेजना शुरू किया, किसी ने नहीं छापा, सबने वापस कर दी।
मैंने दो हफ्ते बाद बाबू के साथ फिर बाबा की शरण में पहुंचा।
बाबा ने ड्रिंक्स पीते हुए पूरे बात सुनी। और कहा, “एक काम करो मुरारी, तुम किसी अच्छे विद्वान् साहित्यकार को अपनी कविता दिखाओ, और देखो कि इनमे क्या बेहतरी उनमे बन सकती है।
मैंने और बाबू ने एक महान साहित्यकार को ढूँढा और उनके पास पहुंचे। उन्हें अपनी कविता दिखाई और कहा, “सर, आप तो साहित्य में अच्छी पैठ रखते है, मैंने कुछ लिखा हुआ है। आप अगर उनमे मौजूद गलतियों को ठीक कर देंगे तो मुझे बुहत ख़ुशी होंगी, आपका आशीर्वाद मिल जायेंगा।“
उन्होंने मेरी कविताएं मेरे हाथ से ली और हम दोनों को बैठने को कहा। फिर उन्होंने पूरी कविताएं मन ही मन में पढ़ी और कहा, “सुनो मुरारी, अभी मुझे कुछ दिन दो, मैं कोशिश करूँगा कि, इसमें मैं कुछ सुधार कर सकू।”
हम दोनों ने उन्हें प्रणाम किया और बाहर की ओर प्रस्थान किया। इसी ख़ुशी में बाबू ने समोसे मांगे, जो मैंने ख़ुशी ख़ुशी में दे दिए। 
एक हफ्ते के बाद उन्होंने हमें बुलाया और कहा,” भाई मुरारी इसमें कुछ नहीं हो सकता है, ये सब कविताएं; साहित्यिक स्तर की नहीं है, इनका कुछ नहीं हो सकता है”
हम दोनों मुंह लटका कर बाहर निकले, बाबू ने मेरी उदासी को भांपते हुए मुझे चाय वाले के ठेले से चाय और नमकीन बिस्किट खिलाये। 
मैं अब उदास हो चला था। कुछ दिन मैंने कुछ नहीं लिखा। फिर एक महीने के बाद मैंने अपनी ही कई कविताओ को कुछ बदले हुए अंदाज में बहुत सारी पत्रिकाओ में छपा हुआ देखा, कवि/लेखक के नाम पर मैंने उस महान साहित्यकार का नाम लिखा देखा। मेरा दिल जल गया, मैं और बाबू गुस्से में उस महान साहित्यकार के घर पर पहुंचे। उन्होंने हमें कोल्ड ड्रिंक्स पिलाया और बिना हमारे पूछे हमसे ये कहा, “ये दुनिया का दस्तूर है भाई, कल तुम भी यही करोंगे, जो मैंने आज किया है, इसलिए गुस्से को नाली में थूक दो और आगे से बेहतर लिखो। मेरी शुभकामनाये तुम्हारे साथ है।“
हम दोनों बहुत गुस्से में उबलते हुए लिटरेचर बाबा के घर पर पहुंचे।