Wednesday, 02 December 2020

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हिंदी साहित्य का अखाड़ा - भाग 3


DISCLAIMER: इस कहानी में उपयुक्त हुए नाम, संस्थाए, जगह, घटनाएं इत्यादि का उपयोग सिर्फ और सिर्फ कहानी को मनोरंजक बनाने के लिए किया गया है। किसी भी व्यक्ति या संस्था से इनका कोई सम्बन्ध नहीं है, कृपया इस कथा को मुक्त हास्य में ले; पर/और दिल पर न ले !!! कथा में निहित व्यंग्य को समझिये ! धन्यवाद ! 



बाबा ने सारी बात सुनी और कहा, “अब इस साहित्यिक दुनिया का यही दस्तूर है, कोई क्या करे। छोडो, अब सुनो, अब तुम अपनी कविताएं लड़की के नाम से लिख कर सभी को भेजो।”
मैं हडबडाया, मैंने कहा, “लड़की बनकर, ये क्या बात हुई?”
बाबा ने कहा, “छपना है तो जो कहता हूँ वो करो।”
मैंने वैसे ही किया। अब मैंने कृष्णा के नाम से अपनी रचनाओ को भेजा। उन रचनाओ को सारी पत्रिकाओं ने छाप दिया। संपादको और आलोचकों ने बहुत तारीफ़ की। कुछ संपादको ने मिलने के लिए भी कहा।
और तो और, पाठको के पत्र आने लगे, बहुत पाठको ने तारीफ़ किया, कुछ ने प्रेम प्रदर्शन भी कर दिया, कुछ ने शादी के लिए भी निमंत्रण दे दिया, इन सब बातो से मेरा दिल जल गया।
जब भी कोई पाठक मुझे प्रेम निवेदन भेजता था, मैं गुस्से में अपने सर के बाल नोच बैठता था, इसी बाल-नोचू प्रोग्राम के कारण मैं गंजा होने लगा।
और एक दिन तो हद ही हो गयी जब मेरे अपने दोस्त बाबु ने मुझे शादी का निमंत्रण भेजा। मैंने ठान लिया कि अब हद हो गयी है, मैने बाबू को चाय की दूकान पर ले गया और उसे उसका भेजा हुआ निमंत्रण दिखाया। बाबू ये देखकर खूब हंसा, मुझे और गुस्सा आया और फिर मैंने उसे वहीँ पर दो चार घूंसे जमाये। वो भी ताव में आ गया और मुझे पीटने लगा। चाय का ठेला फिर कुछ देर के लिए अखाडा बन गया। लोगो ने तमाशा देखा और फिर तालियाँ बजाई। 
बाबू उठकर खड़ा हुआ, और कहा, “साले अपने दम पर लिख, अपने नाम से लिख, क्या लडकियों के नाम से लिखता है। shame on you साले।”
मैंने सहमती में सर हिलाया। उसने अनजाने में ही बहुत बड़ी बात कह दी थी। हम दोनों थोड़ी देर के बाद लिटरेचर बाबा के घर पहुंचे। उन्हें अपनी दास्ताँ सुनाई। उन्होंने कहा, “चलो अब एक काम करो। तुम अंग्रेजी और दुसरे भाषाओ की कहानी और कविता की चोरी करो और उन्हें थोड़ी फेर बदल के साथ लिखकर भेजो।” 
मैंने कहा, “बाबा ये तो चोरी हुई न, मैं नहीं करूँगा।“ 
बाबा ने सुना और फिर अपने लिए शराब का एक पैग तैयार किया। बाबू भी अपने लिए एक गिलास लेकर आ गया। बाबा ने उसे भी शराब दी और फिर एक घूँट लेकर मुझसे कहा, “बेटा मुरारी, जैसा कह रहा हूँ वैसा कर, मैं तुझे एक दिन तेरी कुत्ते वाली कविता पर लिटरेचर अकादमी का अवार्ड दिलवाऊंगा।”
मैंने सर हिलाया, बाबू फिर जोर से ठहाका मारकर हंसा और मेरी पीठ पर एक धौल जमाया। 
मैंने अंग्रेजी और दूसरी भाषो की कहानियाँ और उपन्यास को पढ़ पढ़कर उनके प्लाट चुराने शुरू किये और उनको थोडा फेर बदल कर लिखा और अपने नाम से पत्रिकाओ को छपने भेजा। और फिर क्या था, मेरे अपने नाम से मेरी कहानियाँ छपने लगी। अब मैं धीरे धीरे फेमस होने लगा था। कई पत्रिकाओ में छपने लगा था।
हम लोग फिर लिटरेचर बाबा के पास पहुंचे, उन्होंने दो पैग लगाने के बाद कहा, अब तुम पुरस्कारों के लिए अप्लाई करना शुरू करो।
मैंने कई जगह सम्मान के लिए आवेदन किया पर कहीं बात नहीं बनी, मैं थक गया। 
मैं फिर रोते गाते लिटरेचर बाबा की शरण में पहुंचा, उन्होंने मेरी गाथा सुनी और कहा, “इन सम्मान देने वाली समितियों को धन से मदद करो। ये तुम्हे पुरस्कार देगे।“ 
बस फिर क्या था, करीब करीब हर सम्मान में मेरा नाम होने लगा। लोग मुझे बुला बुलाकर पुरस्कार देने लगे। मुझे बड़ी ख़ुशी हुई, लेकिन इस ख़ुशी के पीछे, मेरे वेतन बंटने लगा और करीब करीब हर दिन मेरे घर में अखाड़े का माहौल रहने लगा। लेकिन साहित्य के पुरस्कार के लिए मैं कुछ भी सहने के लिए तैयार था। 
ऐसे ही एक सम्मान कार्यक्रम में मैंने 5000/- रुपये दिए और बदले में एक शाल, एक नारियल और एक प्रमाणपत्र लेकर आया, ये एक अच्छा बड़ा सा पुरस्कार था, मैंने बाबू और बाबा को पार्टी दी, जब टेबल पर खाना आया तो, बाबू ने खाना खाने से इनकार कर दिया और नशे में चिल्लाकर बोला, “अबे साले; दुसरो की मेहनत से लिखे कहानी और कविता के प्लॉट्स चुराकर लिखता है और उस पर पैसे देकर पुरस्कार खरीदता है ! अपने दम पर कुछ लिख कर पुरस्कार ला, फिर पार्टी देना।“ 
मैं क्या कहता ! उस रात किसी ने खाना नहीं खाया, सिर्फ लिटरेचर बाबा ने खाया। और मुझे देखते हुए कहा “अब तुम ये करो कि अंग्रेजी और दूसरी भाषाओ का साहित्य पढो, उनकी रचनाओ का मर्म समझो और उसे बेस बनाकर कहानियाँ या कविता लिखो।“ 
मैंने फिर बैल की तरह सर हिलाया और कुछ महीनो के लिए अज्ञातवास में चला गया और करीब 1000 किताबे पढ़ डाली, अब मुझे बहुत कुछ समझ में आ रहा था कि कैसे लिखा जाता है। मैंने धीरे धीरे कविताएं और कहानिया लिखना शुरू किया। भले ही विदेशी या दूसरी भाषो का साहित्य का अंश मेरी रचनाओ में रहता हो, पर मैं ही अब अच्छे तरह से लिखने लगा। दूसरी भाषाओ से प्रेरित होकर और बेहतर लिखना शुरू किया, और इस तरह से मैं अपने दम पर ही अब लिख रहा था। और बाबू इस बात से बहुत खुश था।
और उन्हें मैंने पत्रिकाओ में छपने के लिए भेजना शुरू किया। कुछ समय लगा, पर अब ये भी छपने लगी, मेरा पहले ही कुछ नाम हो चूका था और धीरे धीरे प्रसद्धि मिलने लगी। 
फिर कुछ साहित्यकारों ने कहा यार अपनी किताबे छपवा लो, मैंने कई प्रकाशकों के पास अपनी कविता और कहानी की पांडुलिपि भेजी, पर सबने यही कहा, यार कुछ रूपए दो तो छपवा देंगे, सिर्फ तुम्हारे नाम से छपे, अभी तुम इतने बड़े नहीं हुए हो। 
कुछ दिनों के बाद, मैं फिर लिटरेचर बाबा की शरण में था। बाबा ने कहा, “देखो मुरारी, अगर सहित्य के जगत में आगे की यात्रा करनी है तो भाई किताबे तो छपवाना ही पड़ेंगा। और अब जो ट्रेंड है, उसके चलते तुम्हे तो पैसे देकर ही छपवाना पड़ेंगा।“
मैं मरता न क्या करता की स्तिथि में पहुँच चूका था, सो कुछ प्रकाशकों की शरण में गया, अपनी गाढ़ी कमाई उन्हें सौंपी और किताबे छपवाई। बहुत सी साहित्यिक समितियों को अपनी किताबे भेजी, नाम हुआ, पुरस्कार मिला और मेरी साहित्य की गाड़ी चल पड़ी। 
अब मुझे साहित्यिक गोष्टियो में बुलाया जाना लगा, मेरा नाम होने लगा अब मैं पूर्ण रूप से एक साहित्यकार बन गया था। लिटरेचर बाबा की कृपा थी। और बाबू जैसे जानदार दोस्त का साथ !