Wednesday, 25 November 2020

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हिंदी साहित्य का अखाड़ा - भाग 4


DISCLAIMER: इस कहानी में उपयुक्त हुए नाम, संस्थाए, जगह, घटनाएं इत्यादि का उपयोग सिर्फ और सिर्फ कहानी को मनोरंजक बनाने के लिए किया गया है। किसी भी व्यक्ति या संस्था से इनका कोई सम्बन्ध नहीं है, कृपया इस कथा को मुक्त हास्य में ले; पर/और दिल पर न ले !!! कथा में निहित व्यंग्य को समझिये ! धन्यवाद ! 


अब पत्रिकाओ और किताबो और अखबारों में मेरी कविताएं और कहानिया छपने लगी थी। कभी कभी कोई पुरस्कार भी मिल जाता था। और यदा कदा सम्मान भी होते रहते थे। साल में एक या दो किताबे भी छपने लगी थी। और महीने में एक या दो गोष्टियाँ जरुर होती थी। मुझे भी बुलाया जाता था। कविता या कहानी पाठ होता था। एक दुसरे की बुराई भी होती थी। नयी लेखिकाओ पर डोरे डाले जाते थे और शराब पीने के बाद प्रकाशकों से या साथी लेखको से लड़ाई झगडा भी होता था। कुल मिलाकर बात ये थी कि मैं साहित्यकार बन गया था और साहित्य के क्षेत्र में मेरा अपना थोडा नाम भी हो चला था। हाँ ये बात अलग है कि इन सबके चलते मेरी बीबी और बॉस से डांट खाना और बढ़ गया था और मेरे रुपये भी बड़े खर्च हो जाते थे। खैर जी, साहित्यकार बनने की ख़ुशी कोई कम न थी।
समय बीतता रहा और फिर पता चला कि वही पुराने महान साहित्यकार महोदय, जिन्होंने कभी मेरी कविताओ को अपने नाम से छापा था; अब लिटरेचर अकादमी के अध्यक्ष बन गए है। लिटरेचर बाबा मेरी किताबे और कविताओ के बण्डल के साथ राजधानी पहुंचे। और उस महान साहित्यकार से भेंट की और मेरे लेखन का पूरा पुलिंदा उन्हें सौंप दिया और उनसे कहा, “महोदय, जिन सीढीयो पर आप पाँव रखकर यहाँ तक पहुंचे हो, उनमे से एक सीढ़ी इस बालक मुरारी की भी है। याद है इसकी कविताये, जिन्हें आपने अपना मानकर छपवा लिया था। अब समय आ गया है कि आप भी इसे कुछ वापस करे। जीवन तो लेने और देने का ही तो नाम है न भाई।“ अध्यक्ष महोदय ने बैल की तरह सर हिलाया और भाई-भतीजावाद की प्रथा को जीवीत रखते हुए मेरा नाम लिटरेचर अकादमी के अवार्ड के लिए स्वीकार कर लिया।
और फिर एक दिन मेरे लिए एक महान खबर लेकर आया; ये दिन मेरी ज़िन्दगी का सबसे बड़े दिनों में एक था। मेरी कुत्ते वाली कविता को लिटरेचर अकादमी का सबसे बड़ा पुरस्कार मिला था। संपादको और निर्णायको ने उस कविता को इस सदी के सबसे महान कविता का दर्जा दिया और मुझे १,००,०००/- का नकद पुरस्कार की घोषणा हुई। उन दिनों लिटरेचर अकादमी के अध्यक्ष वही महान साहित्यकार थे,जिन्होंने मेरी कविताएं अपने नाम से छाप ली थी। मुझे लग रहा था कि अकादमी में भी लोग अपने ही लोगो को ज्यादा फेवर करते है। खैर मुझे क्या !
मैं बहुत खुश हुआ, ये मेरे लिए मेरी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा तोहफा था। बहुत से अखबारों में मेरी तस्वीर छपी और मेरा इंटरव्यू छपा। टीवी पर मेरे इंटरव्यू आये। पत्रिकाओ और किताबो में नाम हुआ। मेरे बॉस ने मुझे तरक्की दे दी। और बीबी ने डांटना बंद कर दिया। लिटरेचर बाबा और बाबू रोज मुझसे दावत मांगने लगे। वो दोनों खूब हँसते थे। 
पर पता नहीं क्या बात थी; मैं दिन पर दिन चुप होते चला गया। मेरे मन के भीतर कुछ द्वंध सा चल रहा था। मेरी ख़ुशी धीरे धीरे मिटने लगी; मन के भीतर सतत एक आन्दोलन चल रहा था, मेरे भीतर कुछ अच्छा सा महसूस नहीं हो रहा था।
और फिर एक दिन मुझे देश की राजधानी में बुलाया गया और एक रंगारंग समोराह हुआ। मैं, बाबू और लिटरेचर बाबा; हम तीनो वहां गए थे। बहुत देर तक भाषणबाजी हुई। और फिर अंत में मुझे बुलाया गया। मुझे १,००,००० /- नकद दिए गए। मुझे एक अच्छी शाल ओढ़ी गयी, एक नारियल दिया गया और एक मोमेंटो और प्रमाणपत्र दिया गया। और फिर मंच पर उपस्थित महान साहित्यकारों ने मेरी उस कुत्ते वाली कविता के बारे में कहा कि वो एक महान क्रांतिकारी कविता है, उसमे मौजूद बिम्ब आज के आदमी के जीवन के बारे में सटीक व्याख्या देते है। इत्यादि बातो से उस कविता की तारीफ की गयी। मेरे सामने बाबू और लिटरेचर बाबा बैठकर मुंह दबाकर हंस रहे थे और मैं खामोश था। खैर, अंत में मुझे दो शब्द बोलने के लिए कहा गया।
मैं खड़ा हुआ और बोलना शुरू किया।
“आप सभी साहित्यकारों को मेरा प्रणाम। और मेरे मित्र बाबू को एक प्यारा सा आलिंगन और लिटरेचर बाबा को प्रणाम। क्योंकि ये दोनों नहीं होते तो मैं आज यहाँ नहीं होता। कुछ तालियाँ इन दोनों के लिए भी हो जाए।“

कुछ देर तक तालियाँ बजी। मैंने देखा कि बाबू अपनी आँखे पोंछ रहा है 
मैंने आगे कहा, “दोस्तों, आप सभी को मेरी कुत्ते वाली कविता पसंद आई, ये वाकई मेरे लिए बहुत सौभाग्य की बात है। आप सभी ने उस कविता में इतने अर्थ ढूंढ निकाले, जो कि खुद मुझे ही पता नहीं थे। आप सभी का पुनः धन्यवाद। मैं दिल से आप सभी का आभारी हूँ।“ [ तालियाँ बजी ]
“लेकिन कुछ साल पहले की बात है, जब ये कविता पूरी तरह से रिजेक्ट कर दी गयी थी, आप में से कई संपादको के द्वारा फेंक दी गयी थी और इसे कूड़ा कहा गया था और बड़े आश्चर्य की बात है की आज इसे लिटरेचर अकादेमी का सर्वोच्च पुरस्कार मिल रहा है। कमाल है ! और ऐसा कमाल सिर्फ हिंदी साहित्य में ही होता है ये बात नहीं, करीब करीब हर तरह के साहित्य माफिया में ये ही सब होता है, जो मेरे साथ हुआ है।“
एक खामोशी हाल में छा गयी, सब मेरी ओर ध्यान से देखने लगे। इतने में किसी मनचले ने सीटी भी बजा दी। किसी ने कहा “जियो मुरारी - जियो लल्ला !”
मैंने आगे कहा, “और इससे क्या साबित होता है। या तो उस वक़्त इस कविता को आंकने वाले आप जैसे ज्ञानी नहीं रहे होंगे या फिर आज आप सभी ने उस कविता को गलत आंका है। कोई तो बात है। या तो मैं साहित्यकार हूँ और आप सभी साहित्यकार नहीं है या फिर आप सभी साहित्यकार है और मैं नहीं !”
मेरी आवाज़ कुछ तेज हुई, “कभी आप सभी ने सोचा है कि ये क्या हो रहा है साहित्य के क्षेत्र में ! एक अखाड़ा बना हुआ है ! क्या लिखा जा रहा है और क्या सराहा जा रहा है ! किसे बढ़ावा दिया जा रहा है ! कौन आगे आ रहा है ! और हम इस समाज को क्या दे रहे है ? समाज; हमारी प्रमुख जिम्मेदारियों में से एक है और इसे हम अपने लेखन का घटियापन और गंदापन दे रहे है। हम समाज को और नए पढने लिखने वालो को ये शिक्षा दे रहे है कि लिखने के नाम पर, नए लेखन के नाम पर, नए प्रयोग के नाम पर सिर्फ वही गंदगी परोसो, जो समाज में छाई हुई है। ever anyone thought on this; as what are we giving back to young minds ? As a writer, we have to write, because we are here to bring some change in the society! And this is the only way that we can contribute our share to this world for a change! लेकिन हम आज ऐसा नहीं कर रहे है और ये एक भयानक सत्य है! एक ऐसा सत्य जो कि दो पीढ़ियों को एक साथ ही ख़त्म कर रहा है।“
एक भयानक सी ख़ामोशी पूरे हाल में छायी हुई थी। 
मैंने आगे कहा, “लेकिन आज क्या हो रहा है, ये देखिये ! माफ़ कीजिये, प्रेमचंद या बाबा नागार्जुन या रांघेय राघव ने या राकेश मोहन इत्यादि साहित्यकारों ने ऐसे लेखको के बारे में स्वप्न नहीं देखा था, जो आज हमारे साहित्य के क्षेत्र में बसे हुए है। आज किसी को लिखने की लालसा नहीं है, बल्कि पुरस्कार की लालसा है, सम्मान की लालसा है, किताब छापने की लालसा है, प्रसिद्द होने की लालसा है और धन कमाने की लालसा है, मैं भी कोई अपवाद नहीं; पर इन सबके पीछे दोषी कौन है। आप सभी और आप सभी के कारण आज का लेखक लिखता नहीं है बल्कि वो सब करता है, जो मैंने कहा है। और यही बात सबसे भयानक है।“
मैंने सांस ली और पानी पिया, मेरे मन का गुबार निकल रहा था। 
मैंने फिर आगे कहा, “आज साहित्य एक बहुत बड़ा अखाड़ा बन कर रह गया है। हम,अपना ज्यादा वक्त इसमें लगाते है कि दूसरे ने क्या लिखा। जबकि हमने ये सोचना चाहिए कि हम क्या लिख रहे है।आज की साहित्यिक दुनिया कितनी बदल गयी है। रचनात्मकता के बदले में आपस में बैर पैदा हो रहा है। हम ने साहित्य को क्या से क्या बना दिया।”
‘आज का दौर अब कुछ ऐसा बन गया है कि साहित्य के नाम पर सिर्फ शोर ही रह गया है, सब कुछ personal preference में रख दिया गया है, जिसे चाहो रखो, जिसे चाहो हटा दो। किसी को गाली दी जा रही है। कोई मारपीट पर अमादा है। कोई moral policing पर उतारू है। लोग दूसरो के बारे में ज्यादा लिख रहे है। चारो तरफ मचे इस दुखद शोर में अच्छा लिखने वालो की गति खराब हो गयी है। मतलब ये कि साहित्य का अच्छा ख़ासा तालाब अब गन्दा हो चूका है वो भी सिर्फ चंद so called साहित्यकारों की वजह से।