Wednesday, 02 December 2020

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हिंदी साहित्य का अखाड़ा - भाग 5


DISCLAIMER: इस कहानी में उपयुक्त हुए नाम, संस्थाए, जगह, घटनाएं इत्यादि का उपयोग सिर्फ और सिर्फ कहानी को मनोरंजक बनाने के लिए किया गया है। किसी भी व्यक्ति या संस्था से इनका कोई सम्बन्ध नहीं है, कृपया इस कथा को मुक्त हास्य में ले; पर/और दिल पर न ले !!! कथा में निहित व्यंग्य को समझिये ! धन्यवाद ! 



दोस्तों; यहाँ सवाल नीयत का है। सवाल attitude का है। सवाल identity crisis का है। सवाल एक नकली अधिपत्य का है। सवाल एक दमित मानसिकता का है। सवाल एक दुसरो को सहित्य जैसे एक पब्लिक प्लेटफोर्म पर नीचा दिखाने का है। सवाल सिर्फ और सिर्फ दंभ का है। और सवाल यूँ ही बेवजह फसाद करने का है। न खुद शांत रहो और न ही दुसरो को शांत रहने दो। ये क्या है। हम खुद के सामने और अपने ईश्वर के सामने क्या साबित करने जा रहे है।”

“क्या कभी कोई सोचता है कि What exactly went wrong in the world of HINDI literature? हम में से किसी ने इस विषय पर soul searching नहीं किया। बात बहुत सीधी सी है। हम में से कुछ लोग ऊपर बैठकर judgment करने लगे। दुसरो के लिखावट और तौर तरीको पर और उनके लेखन में मौजूद विषयो पर अपना निर्णय देने लगे। वो ये भूल गए कि साहित्य का बहुत सीधा सा मकसद ये ही था और ये है है कि अपनी creativity को एक प्लेटफार्म दो। कुछ लिखो, कुछ ज्ञान की गंगा बहाओ। और उन दिनों ये सब बहुत अच्छे से होता था और आज भी होता है। उन दिनों सभी खुश रहते थे, सिवाय कुछ हलकी झड़पो के अलावा। लेकिन आज तो हिंदी साहित्य का क्षेत्र बाकायदा अखाड़ा बन गया है। लिखने के नाम पर बस दोषारोपण ही किया जा रहा है। क्यों हम ऐसे हो गए है। जिनके साथ मिल कर हँसते थे, अब उनसे लड़ने के बहाने ढूंढें जाते है। हम कहाँ से कहाँ आ गए। साहित्य के क्षेत्र का जो हाल बना हुआ है आजकल उसे देखकर सिर्फ दुःख ही होता है। क्या करने चले थे और क्या हो रहा है। सिर्फ कांव कांव मच रही है सारे झमेले में न हिंदी बच रही है और न ही साहित्य। हम लोगो ने अब हिंदी साहित्य को समाज का ही extension बना लिया है। बस सिर्फ शोर ही बचा है। 

“तो दोस्तों। क्या हमें ये अधिकार है कि हम दुसरो के लेखन पर ऊँगली उठाये, उसे भला बुरा कहे। नहीं दोस्तों नहीं। हम अपने आपको कब तक स्वंयभू ठेकेदार मानेंगे तथाकथित हिंदी साहित्य के। सारी समस्या इस बात की है कि हम अपने अहंकार को अपने पर लाद कर हिंदी साहित्य के शीर्ष सिंहासन पर बैठना चाहते है। और साथ ही दूसरों के लेखन में अच्छा बुरा ढूँढना चाहते है। लेकिन याद रहे कि प्रभु ईशा ने भी यही कहा है कि पहला पत्थर वो मारे जिसने पाप न किया हो। हम पहले अपने लेखन को परखे और दुसरो को क्यों JUDGE करे।”

“नहीं दोस्तों, ऐसा नहीं होना चाहिए। हर आने वाली पीढ़ी अपनी पिछले पीढ़ी को देखती है उनसे कुछ सीखना चाहती है और हम उन्हें क्या दे रहे है। और ये हम सभी का कर्त्तव्य है कि हम एक मिसाल पेश करे अपने आने वाली पीढ़ी के लिए। हमें ये सोचना है की हमने ये सब करके क्या खोया है क्योंकि सिवाय मन की झूठी ख़ुशी के अलावा हमने कुछ भी नहीं पाया है।”

“आज एक सोच की जरुरत है। एक नए आयाम की जरुरत है। हम पहले इंसान बने, फिर दोस्त बने और अंत में अपने कर्म के लिए लेखक बने। लेकिन आज हम सिर्फ नकली इंसान बनकर रह गए है। न ही दोस्त रहे और जब दोस्त नहीं रहे तो इंसान भी नहीं रहे। जीवन क्षणभंगुर है। तो क्या हम दुसरो के दिलो में अपने लिए वैमनस्य छोड़ जायेंगे। और फिर हमें ये सोचना है कि, इस सारी प्रक्रिया में हमारी खुद की creativity ही मर गयी है। जो अच्छी कविता,कहानी, व्यंग्य, आलेख और लेख लिखते थे वो अब सिर्फ दुसरो के लिए लिखते है। कहाँ जा रहे है हम।“ 

मैंने एक लम्बी सांस ली और पानी पिया और आगे कहने लगा, “आप सभी सोचिये कि आप सभी किस तरह के साहित्यकार को पैदा करने की कवायद में लगे हुए है। आप सभी एक पूरे युग के साहित्य को मारने के षड्यंत्र में शामिल है, जाने अनजाने ही सही; पर हाँ; आप सभी दोषी है। आज देखिये क्या हो रहा है। नए लेखन और अगर यौन मुक्तता के नाम पर यदि ग्राफ़िक डिटेल्स लिख देता है तो उसकी कहानी पहले छप जाती है। और अगर ये कथा कोई लेखिका लिखे तो तुरंत से भी जल्दी में कुछ हो तो उसी स्पीड में छप जाती है। और तो और उसे नयी कहानी के नाम पर अवार्ड भी मिल जाता है। क्या कर रहे है हम। क्यों हम लेखन के नाम पर पढने वालो को tantalising कर रहे है। क्या गंदगी में और साहित्य में कोई अंतर नहीं। लिखने वाले फिर वही लिखते है, जो छपता है, फिर अच्छे और बुरे लेखन का फर्क ख़त्म हो जाता है। मेरे जैसे दुसरे लेखक देखते है कि उनकी मानवता वाली कविता या दोस्ती पर लिखी कहानी नहीं छप रही है तो वो खून के घूँट पीकर रह जाते है। धीरे धीरे वो लिखना बंद कर देते है। और एक अच्छा सा लेखक, एक बहुत अच्छा लेखक बनने से पहले ख़त्म हो जाता है, मर जाता है। और आप सब होते है उसके हत्यारे !!! हाँ !”

पूरे हाल में पिन ड्राप सायलेंस था।
मैंने फिर पानी पिया और आयोजक की ओर देखते हुए गुस्से से कहा, “पानी की जगह दारु रखा करो, साहित्यकार का असली रंग तो दारु पीने के बाद ही तो पता चलता है”
एक हलकी हंसी हाल में दौड़ पड़ी, मैंने देखा कि बाबू सबसे ज्यादा ठहाका लगा रहा है।
आयोजक ने कुछ गुस्से में कहा, “इतनी बड़ी बड़ी बाते करते हो, तुम तो मंटो के मुरीद हो, क्या उसने ये सब नहीं लिखा ?” 
मैंने कहा, “हाँ मैं मुरीद हूँ पर उसकी उन कहानियो का, जिन्होंने उस वक़्त के समाज को दर्शाया। मैं कायल हूँ टोबा टेकसिंह और खोल दो जैसी कहानियो का, लेकिन बू जैसी कहानिया मुझे सख्त नापसंद है। लेकिन कहाँ मंटो और कहाँ ये आजकल के लिखने वाले और उनको छापने वाले। मैं अपनी पसंद नहीं बता रहा हूँ मैं ये कह रहा हूँ कि हम एक बेहतर समाज की रचना तब ही कर सकते है जब एक बेहतर साहित्य लिखा जा सके। और ये तब ही होगा जब हम सभी साफ़ सुथरा और बेहतर लिखने का प्रयास करे।”
मैंने एक गहरी सांस ली।
मैंने फिर कहा, “साहित्य समाज का दर्पण है लेकिन ठीक उसी समय वो समाज को दुरस्त करने का सबसे बड़ा उपाय भी है। दलित लेखन ने समाज में एक बदलाव लाया। हास्य-व्यंग्य में लिखी गयी कहानिया का कुछ असर समाज में जी रहे इंसान पर हुआ। प्रेमचंद की कहानियो ने एक बेहतर समाज का सपना देखने के लिए हम सबको प्रेरित किया। अमृता, गुलज़ार आदि ने प्रेम को स्वीकार करने की बात कही। बुल्ले शाह तथा दुसरे सूफी संतो ने अध्यात्म को एक नया अर्थ दिया। पर आज क्या हो रहा है। प्रेम के नाम पर शरीर के बारे में लिखा जाता है। अध्यात्म के नाम पर धर्मांध बनाया जाता है। और एक बेहतर समाज के बदले में एक quick life को कैसे अपनाया जाए ये बता दिया जाता है। और इन सब को लिख पढ़कर साहित्यकार को पुरस्कार और सम्मान की चाह हो जाती है”
तभी किसी मनचले ने चिल्लाया, “ओये मुरारी; तेरा क्या, तुझे तो अवार्ड मिल गया न, तू कोई अलग है क्या?“
मैंने कहा, “हां, मैं अब अलग हूँ, जब मैंने अपनी साहित्यिक यात्रा शुरू की थी, तो मैं भी इसी भेडचाल का शिकार हुआ था और कई तरह के अलग अलग दांव पेंच लगा कर मैं यहाँ तक पहुँच पाया हूँ, लेकिन इस पूरी यात्रा में सच कहता हूँ यारो, मेरी सृजनात्मकता ख़त्म हो गयी ! मेरे भीतर का लेखक मर गया। और ये मेरा आखरी अवार्ड है। न मैं इस के बाद लिखने वाला हूँ और न ही किसी अवार्ड को लेनेवाला हूँ लेकिन जाते जाते मैं यही कहूँगा कि आप सभी से मेरा एक विनम्र निवेदन है; एक नयी धारा को स्थान दीजिये, एक नए लेखक को जन्म लेने दीजिये। साहित्यकार को और साहित्य को जीते जी मत मारिये। उन दोनों को जीने दीजिये, उन्हें जीवित रखेंगे तो एक पूरी पीढ़ी आपका आभार मानेंगी ! और मैं ये भी कहना चाहूँगा आपसे की अच्छे लिखने वाले और अच्छा पढने वाले दोनों ही मौजूद है इस संसार में। आप सभी बस उन्हें परखे, उन्हें मौका दे। दोस्तों।। It’s high time that we all should wake up and makes a new great platform for all the new writers। आईये, सारे झगडे झंझटो को पीछे छोड़े और एक बेहतर हिंदी साहित्य जगत की ओर अग्रसर हो जाए। आईये कुछ बेहतर करे कि अब कोई मलाल नहीं रहे।किसी को कोई दुःख न पहुंचे, अपनत्व बांटे। प्यार बांटे। खुश रहे और खुश रखे। यही जीवन है।”