Wednesday, 02 December 2020

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हिंदी साहित्य का अखाड़ा - भाग 6 अन्तिम


DISCLAIMER: इस कहानी में उपयुक्त हुए नाम, संस्थाए, जगह, घटनाएं इत्यादि का उपयोग सिर्फ और सिर्फ कहानी को मनोरंजक बनाने के लिए किया गया है। किसी भी व्यक्ति या संस्था से इनका कोई सम्बन्ध नहीं है, कृपया इस कथा को मुक्त हास्य में ले; पर/और दिल पर न ले !!! कथा में निहित व्यंग्य को समझिये ! धन्यवाद ! 



अंत में मैं अमृता प्रीतम की एक बात को यहाँ रखना चाहता हूँ, उन्होंने कहा था कि लेखन की सारी दुनिया में मसला सिर्फ और सिर्फ प्यार और व्यापार का ही है कि कौन अक्षरों को प्यार करते है और कौन इनका व्यापार करते है। और एक लेखक को इस बात का बहुत ध्यान रखना चाहिए।” 

“तो, आज आप सभी से मैं विनम्र विनती करूँगा कि आईये, अक्षरों से प्रेम करे न कि उनकी सहायता से एक दुसरे पर वार करे। और शायद आज ही के इस दिन के लिए पाकिस्थान के एक शायर मजहर -उल- इस्लाम ने कभी लिखा था:

ऐ खुदा ! अदीबो के कहानियो और कलमो में 
सच्चाई, अमन और मोहब्बत उतार !
ऐ खुदा ! लालटेन की रौशनी में लिखी हुई 
इस दुआ को कबूल कर  !

“आईये दोस्तों, हम अपनी कलम में सिर्फ दोस्ती और प्यार का रंग भरे और एक बेहतर और मजबूत और अपनत्व से भरी हुई हिंदी साहित्य को भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के हर कोने में जहाँ भी हिंदी पढ़ी, बोली और लिखी जाती है,स्थापित करे। इसी के साथ मैं अपने हिंदी साहित्य जगत की बेहतरी के लिए प्रार्थना करता हूँ।“ 

और दुष्यंत कुमार के एक खूबसूरत शेर के साथ आप सभी से विदा लेता हूँ। 
"सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए !!” 

“आपका धन्यवाद।“ 
अपने मन की बात कहकर मैं नीचे उतर गया। सारे हाल में एक सन्नाटा था। 
सबसे पहले बाबू ने उठकर ताली बजाई और फिर लिटरेचर बाबा ने। और उस मनचले ने सीटी बजाई और जोर से कहा, “ओये तू जिंदाबाद !” फिर सारे लोगो ने उठकर ताली बजाई।
मैं सर झुकाकर, बाबू और लिटरेचर बाबा के साथ हाल से बाहर निकल गया।
मैं बाहर निकला, मेरा मन बहुत भरा हुआ था। आँखे कुछ भीगी सी थी। दिल में एक तूफ़ान सा था। 
बाहर निकलने पर मैंने देखा एक गरीब बूढी औरत ठण्ड के मारे कांप रही थी। मैंने उसे सम्मान में मिली शाल दे दी। कुछ दूर पार्किंग तक जाने पर एक बच्चा भीख मांगते हुए दिखा, उसे नारियल दे दिया।
उसी रात को, रात के फ्लाइट से हम तीनो अपने शहर पहुंचे। 
फिर बाबा की गाड़ी में बैठकर मैं और बाबू अपने शहर के वृद्धाश्रम, विधवा आश्रम और अनाथ बच्चो के आश्रम गए, जहाँ मैंने पूरी पुरस्कार राशि बाँट दी। 
मन अब हल्का हो गया था। फिर मैं और बाबू, लिटरेचर बाबा के साथ अपने पुराने चाय के ठेले पर गए। वो आधी रात के बाद भी खुला रहता था, हम जैसे लिखने वालो के लिए और कड़ी मेहनत से पढ़कर परीक्षा में पास होने वाले बच्चो के लिए और मजनुओ के लिए। वहां हमने चाय पी। मैंने वो मोमेंटो जो मुझे सम्मान में मिला था बाबा के चरणों में रख दिया और फिर जेब में हाथ डाले सीटी बजाता हुआ चल दिया। 
वो सितम्बर का महीना था और मैं “come september” की धुन को बजा रहा था। इतने में पीछे से बाबू ने आवाज दी, “अबे ओ साहित्यकार,एक कविता तो लिख ले।“ मैंने मुड़कर देखा और उसे अपना घूँसा दिखाया। हम सब जोरो से हंस पड़े।
घर पहुंचा तो अँधेरा सा था, जैसे ही मैंने सीढ़ी पर पाँव रखा, वहां पर सोये हुए एक कुत्ते की पूँछ पर मेरा पैर पड़ गया और वो जोर से चिल्लाकर पीछे की ओर मुड़ा और गुस्से में मेरे पैर को काट लिया। अब चिल्लाने की बारी मेरी थी। कुत्ता भाग गया। घर की लाइट जली, बीबी ने दरवाजा खोला और कहा, “अरे! अब क्या हुआ ?” मैने कहा, “अरे, एक कुत्ते ने फिर मुझे काट लिया है।” बीबी ने कहा “अरे तो यहाँ क्यों खड़े हो, जाओ हॉस्पिटल में जाकर इंजेक्शन लगाओ। पता नहीं ये कुत्ते तुम्हे ही क्यों काटते है !”
मैं मुड़ा और बडबडाते हुए हॉस्पिटल की ओर चल पड़ा। अचानक मेरे होंठो पर एक मुस्कराहट आ गयी। कुत्ते ने काटा है, तो जरुर कुछ नया घटित होंगा मेरे जीवन में। देखते है; वो कहानी फिर कभी ! 

समाप्य