Sunday, 24 September 2017

आतंकवाद पर सुरक्षा परिषद प्रस्ताव का महत्व


संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा आतंकवाद एवं आईएसआईएस सहित अन्य आतंकवादी समूहों के खिलाफ सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव करना अपने आपमें महत्वपूर्ण घटना है। इससे सीधा संदेश निकला है कि पूरी दुनिया मजहबी हिसंक उन्माद से भरे आतंकवादी संगठनों के खात्मे के लिए एकजुट है। वास्तव में इस प्रस्ताव का मनोवैज्ञानिक और संदेशात्मक महत्व ज्यादा है। विश्व समुदाय इतनेे सूक्ष्म विस्तार में नहीं जाता कि इसमें क्या लिखा है, किन देशों पर आतंकवादी समूहों को खत्म करने या उनसे संघर्ष करने की जिम्मेवारी डाली गई है, किस तरह एकजुट होकर वे लड़ंेगे आदि आदि। विश्व भर के आम नागरिकों के लिए तो संदेश एक ही है कि चलो देर से ही सही सुरक्षा परिषद को यह इल्म हुआ कि उसे फिर एक बार आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को वैधता और आक्रामकता प्रदान करनी चाहिए और उसने कर दिया। दूसरे, अगर उसने प्रस्ताव कर दिया तो फिर आईएसआईएस एवं अन्य हिंसक संगठनों के खिलाफ अब जो भी कार्रवाई होगी वह मान्य होगी और इसे विश्व समुदाय की सम्मिलित कार्रवाई मानी जाएगी। 

हम कह सकते हैं कि अरे सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव कौन सी नई बात है। 1999 से उसने 14 प्रस्ताव केवल आतंकवाद पर पारित कर दिया था तो एक और हो गया। उन 14 प्रस्तावों के बाद क्या आतंकवाद खत्म हो गया? क्या वाकई दुनिया एक होकर आतंकवाद के खिलाफ मुकाबला कर पाई? ऐसे और भी प्रश्न उठाए जा सकते हैं और इनको एकदम नावाजिब भी नहीं कहा जा सकता। किंतु यह मान लेना कि पहले पारित प्रस्तावों से कुछ हुआ ही नहीं या फिर अभी जो प्रस्ताव पारित हुआ है उससे भी कुछ होगा नहीं, बेमानी होगा। आतंकवाद का खात्मा नहीं हुआ है लेकिन पहले के प्रस्तावों का असर तो हुआ है। 2001 में पारित प्रस्ताव संख्या 1373 में आंतकवादियों के वित्त रोकने, सुरक्षित पनाहगाह खत्म करने और उनके खिलाफ जांच में सहयोग करने को कहा गया था। इस दिशा में काफी काम हआ। इससे खुलकर आतंकवाद को वित्त पोषण एवं पनाह देने की स्थिति का अंत हो गया। इसी तरह 2005 में पारित प्रस्ताव संख्या 1624 में सदस्यों देशों से आतंक के खिलाफ कानूनी प्रावधान करने के साथ कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश था। ज्यादातर देशों ने अपने यहां ऐसे कठोर कानून बनाए तथा कार्रवाई भी किए हैं। एक दूसरे के बीच कई स्तरों पर सहयोग विकसित हुआ है। जरा यह कल्पना करिए कि आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव पारित नहीं हुआ होता और उस पर हमले नही होते तो आज दुनिया की क्या स्थिति होती? इसका उत्तर आपको स्वयं मिल जाएगा। ठीक है कि आतंकवाद से संघर्ष में गलतियां हुई हैं और उनके दुष्परिणाम भी सामने आए हैं, लेकिन इस समय विस्तार से चर्चा की बजाय समय की मांग हर हाल में विश्व में चारों तरफ फैल रहे आतंकवाद के फन को कुचलने के लिए विश्व संगठन की हरि झंडी देने की थी और उसने दे दिया। 
सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव की भाषा में आतंकवाद और आईएसआईएस जैसे समूहों के खिलाफ एकदम कडी भाषा का प्रयोग किया है औरं सदस्य देशों से अपील की गई है कि वे आईएस सहित और अन्य कट्टरपंथी समूहों के हमले को रोकने के लिए अपने प्रयास दोगुने करें। हाल के दिनों में पहले तुर्की की राजधानी अंकारा, फिर बेरुत, फिर पेरिस हमला और उसके करीब एक सप्ताह बाद माली के बमाको के होटल पर हुए हमले के बाद भी यदि सुरक्षा परिषद सोया रहता तो उसका संदेश काफी बुरा जाता। इससे आतंकवादियों का हौंसला और बढ़ता। इसलिए बमाको के होटल पर हमले के केवल कुछ घंटे बाद विश्व संस्था ने यह प्रस्ताव पारित कर दिया। इससे विश्व समुदाय के अंदर यदि आश्वासन का भाव पैदा होगा तो आतंकवादी संगठनों के अंदर यह भय कि दुनिया के प्रमुख देश उसकी कमर तोड़ने के लिए ज्यादा सघन कार्रवाई करेंगे। े आलोचक कह रहे हैं कि सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव में आईएस के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के लिए कोई कानूनी मंजूरी नहीं है। इसमें संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अध्याय सात के तहत दी जाने वाली शक्तियों का भी उल्लेख नहीं है। इसके जरिये सुरक्षा परिषद बल प्रयोग की इजाजत देता है। किंतु यह आलोचना एकपक्षीय है। आतंकवाद विरोधी युद्व के लिए इसकी  इजाजत पहले से मिली है। प्रस्ताव में अगर यह कहा गया है कि आईएस व अन्य संगठन अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा के लिए एक वैश्विक और अभूतपूर्व खतरा है तो इसका मतलब है कि शांति और सुरक्षा का वातावरण विश्व में फिर से वापस लाने के लिए इनका नाश करना आवश्यक है। इसलिए प्रस्ताव में इसे अभूतपूर्व खतरा बताते हुए हर संभव माध्यमों का उपयोग करते हुए इससे निपटने को लेकर सुरक्षा परिषद ने प्रतिबद्धता व्यक्त की है। ध्यान रखिए, सभी माध्यम शब्द का प्रयोग सामान्यतः नहीं होता। सभी माध्यम में सैन्य कार्रवाई नहीं शामिल है क्या? 
इस समय फ्रांस प्रतिशोध एवं छटपटाहट के जिस मनोविज्ञान से गुजर रहा है, उसमें उसकी ओर से आया प्रस्ताव इसी प्रकार का हो सकता था कि आईएसआईएस या पश्चिम अफ्रिका में सक्रिय अलकायदा के सहयोगी नुसरा फ्रंट जैसे सहयोगी को खत्म करने के लिए हर प्रकार के माध्यम के उपयोग की आजादी होनी चाहिए। हर संभव माध्यम की छूट के बाद वे किसी प्रकार के हथियार का उपयोग कर सकते हैं। इसके लिए अलग से सैन्य कार्रवाई की इजाजत जैसे शब्द की आवश्यकता ही नहीं है। पेरिस हमले के बाद वहां संसद में आपातकाल के समय विस्तार प्रस्ताव पर बोलते हुए फ्रांस के प्रधानमंत्री ने कहा कि आतंकवादी रासायनिक एवं जैविक हमले भी कर सकते हैं। पता नहीं करेंगे या नहीं, लेकिन अगर उनका खतरा है तो फिर बंधे हाथ से आप उनका मुकाबला नहीं कर सकते। इसलिए हर संभव माध्यम की आजादी प्राप्त की गई है। फ्रांस सीरिया मंें आईएसआईएस ठिकानों पर फूल थोड़े ही बरसा रहा है। या दूसरे देश वहां केवल फूलझड़ियां नहीं छोड़ रहे हैं। आतंकवाद से संघर्ष में सीधे सैन्य कार्रवाई के अलावा सामान्यतः तीन प्रकार की कार्रवाई की अपेक्षा है। एक, आईएस या दूसरे आतंकवादी संगठनों में भर्ती होने के लिए आने वाले युवकों को रोकने और उनके खिलाफ कार्रवाई करने का प्रयास करना होगा। दूसरे, आतंकवादी संगठनों को वित्त मुहैया कराने या प्रचार में सहयोग करने वालों पर भी सदस्य देश नकेल कसेंगे। एवं तीन, आईएस वं अन्य आतंकवादी समूहों के सुरक्षित पनाहगाहों को ध्वस्त करने के लिए सदस्य देश आपस में सहयोग करेंगे। 
प्रस्ताव में समन्वित कार्रवाई की भी बात है। यानी सभी देशों की कार्रवाई में समन्वय हो। यह उचित और आवश्यक भी है। वैसे समन्वित कैसे होगा इसका कोई विवरण प्रस्ताव में नहीं है। दरअसल, यह आवश्यक होते हुए भी जरा कठिन है। समन्वित होने के लिए कोई एक नेतृत्वकर्ता चाहिए। सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों को पता था कि किसी एक के नेतृत्व के प्रश्न पर एकमत कायम करना कठिन होगा। खासकर रुस अमेरिका का नेतृत्व स्वीकार नहीं करेगा तो अमेरिका रुस का। इसी तरह फ्रांस का नेतृत्व अमेरिका या ब्रिटेन को स्वीकार होगा या नहीं इसे लेकर भी संदेह था। हालांकि इस समय फ्रांस और ब्रिटेन आतंकवाद को लेकर काफी निकट आ गए हैं, रुस एवं फ्रांस में भी सहयोग विकसित हो गया है फिर भी किसी एक के नेतृत्व मंें समन्वय के रास्ते कठिनाई थी,इसलिए इसे यूं ही छोड़ दिया गया है। हम जानते हैं कि सीरिया सहित विभिन्न मसलों पर सुरक्षा परिषद में रूस तथा अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन का अलग-अलग रुख रहा है। कई अवसरों पर सीरिया संबंधी प्रस्ताव पर रूस ने वीटो तक करने की धमकी दी थी। इसी तरह रूसी प्रस्ताव पर अमेरिका अपने ले विशेषाधिकार का इस्तेमाल करता रहा है। लेकिन सुरक्षा परिषद के वर्तमान इस प्रस्ताव पर सर्वसम्मति भविष्य की अलग संभावनाओं की ओर संकेत कर रहे हैं और अमेरिका की रुस विरोधी भाषा में काफी लचीलापन आ गया है। फ्रांस का तो रुस एवं ब्रिटेन के साथ एक प्रकार का सहयोग ही स्थापित हो गया है। वास्तव में रुस और फ्रांस के अलग-अलग कार्रवाई करते हुए भी उनके बीच एक हद तक समन्वय है। अमेरिका भी तेजी से बमबारी करने लगा है और वह भी फ्रांस एवं ब्रिटेन से लगातार संपर्क में है एवं यह सूचना दे रहा है कि कहां हमला करना है, किया और उसके असर क्या हुए। तो इस तरह चार देशों के बीच प्रत्यक्ष-परोक्ष बिना नेतृत्व या एक कमान और नियंत्रण् प्रणाली के न होने के बावजूद हमले में समन्वय को किसी सीमा तक स्थापित हो ही गया है। 
--- अवधेश कुमार