Wednesday, 13 December 2017

कालजयी कवि बांकीदास आशिया

कालजयी कवि बांकीदास आशिया

अमूमन हम पढ़ते और सुनतें हैं कि डिंगल कवियों की रचनाओं में युगबोध नहीं होता है और न ही समकालीन सोच!!डिंगल कवियों पर यह भी आरोप  लगाया जाता रहा है कि उनकी रचनाओं में संवेदनाओं और आम आदमी की व्यथा कथाओं का समावेश नहीं के बराबर होता है।प्रायः यह भी सुना जाता है कि डिंगल काव्य केवल और केवल सामंतवादी सोच का प्रतिनिधित्व करता है ऐसे में ठकुर सुहाती और अतिशयोक्ति पूर्ण रचनाओं का प्रतिपादन ही हुआ है।इन आरोपों की सत्यता शायद ही किसी ने खोजने की कोशिश की हों!क्योंकि जबतक हम पूर्वाग्रहों से ऊपर नहीं उठ सकतें और न ही हम अपनी दमित कुंठाओं को त्याज्य समझते तबतक न तो हम हमारा दृष्टिकोण बदल सकतें हैं और न ही सत्य की पड़ताल़ कर सकतें हैं।
साहित्य की परिभाषा ही सब का हित संधान करने वाला होता है तो फिर इसका सृजक चाहे वो किसी भी जाति ,समुदाय अथवा धर्म का क्यों न हो वो व्यष्टिपरक हितसंधान की बात कैसे सोच सकता है?क्या कबीर,रहीम,ईशरदास,बारहठ आदि मनीषी  केवल अपने धर्म तक ही सीमित रहे या उन्होंने उस क्षुद्र बंधनों को तोड़ा!!
इसी बात को मध्यनजर रखकर मैंने कविराज बांकीदासजी आशिया को पढ़ा।
जब हम डिंगल कवि के बतौर बांकीदास जी को पढ़तें हैं तो जो आरोप डिंगल कवियों पर लगाए जाते रहें हैं वे सारे के सारे निर्मूल सिद्ध होते हैं।
कविराज बांकीदास जी (1828-1890) का जन्म भांडियावास (पचपदरा) के आशिया फतैसिंहजी के घर हुआ ।इन्हें महाराजा मानसिंहजी (जोधपुर)ने अपना कविराज बनाकर अपना भाषा गुरु भी स्वीकारा।संस्कृत,डिंगल, पिंगल, फारसी आदि भाषाओं में पारंगत कविराज ने लगभग चालीस छोटे- बड़े ग्रंथों का प्रणयन करके राजस्थानी साहित्य को समृद्ध किया।ये जितने पद्य में प्रवीणता रखते थे उतनी गद्य में इन्हें महारत प्राप्त थीं।इन्होंने महाभारत का गद्यानुवाद 'महाभारत री कथा सार संग्रह'  के रूप में करके यह सिद्ध किया कि भाषा की समृद्धता गद्य सृजन से ही संभव है।
कविराज बांकीदास जी की पद्य रचनाओं का हम समग्र अध्ययन करते हैं तो उनका अभिजात्य वर्ग के कवि रूप से कहीं बढ़कर उनके आम आदमी के पक्ष में अभिव्यक्ति  करने वाले कवि रूप से हम परिचित होते हैं।
एक सजग,संवेदनशील , दूरदृष्टा व  समष्टिमूलक हितैष्णा वाले कवि का सहज रूप हमारे सामने आता है।
 उस समय पूरा देश,पूरे देशी राजा अंग्रेजों के आतप से आतंकित और शंकित थे।उनके खिलाफ किसी में चूं तक करने की हूंस नहीं थी उस समय इस भविष्यदृष्टा कवि ने भारतीय जनमानस को  जाति ,पांति धर्म समुदाय की भावनाओं से ऊपर उठकर अंग्रजों का संगठित मुकाबला करने का आव्हान किया था।इस प्रकार का बेबाक उद्घोष करके सुशुप्त भारतीय जनमानस में जोश संचरण करने का  प्रथम श्रेय लेने वाले बांकीदासजी ही थे।
1857के गदर से 52 वर्ष पूर्व अर्थात 1805ई. में 'चेतावणी रो गीत' लिखकर राजस्थान के राजाओं को फटकारते हुए अंग्रेजी की कुचालों से बचने का आव्हान किया था।जोधपुर के कविराज होते हुए भी भरतपुर के जाट शासकों के अदम्य साहस व अप्रतिम शौर्य की सराहना निष्पक्ष व निडरता से की थी-
छत्रपतियां लागी नह छांणत
गढ़पतियां धर परी गमी।
बल़ नह कियौ बापड़ां बोतां
जोतां जोतां गई जमी।
वजियो भलो भरतपुर वाल़ो
गाजै गजर धजर नभ गोम।
पहलां सिर साहब रौ पड़ियौ
भड़ ऊभां नह दीधी भोम।।
बांकीदासजी ने अपनी रचना चुगल मुख चपेटिका  में  अंग्रेजों की धूर्तता व घातक कूटनीति से सावधान करते हुए लिखा है कि-
चुगल फिरंगी अत चुतर
विद्या तणा विनांण।
पांणी मांहै पलक में
आग लगावै आंण।।


बांकीदासजी ने उन तमाम राजाओं व ठाकुरों की कटु निंदा की जो गुपचुप तरीके से विदेशी सत्ता को दंड भरते थे और  ऊपर से अपनी निडरता बताया करते थे-
सुहड़ां सीख घरां नै समपे
गोढे राखो गोला।
रुपिया जाय भरो अंगरेजां
बंगल़ै बोला बोला।।
जब अंग्रेजों ने भरतपुर पर हमला किया तो वहां के जाट शासकों ने जो साहस दिखाया उसकी मुग्ध कंठ से प्रशंसा मारवाड़ के इस कवि ने सबसे पहले की।
यही कवि का कविधर्म होता ।भरतपुर शासकों के श्रद्धेय महंत ने जब भरतपुर के साथ घात की और लोभवश फिरंगियों का साथ दिया उसीके परिणामस्वरूप जाटों को पराजय का सामना करना पड़ा तो इस महान देशभक्त कवि का हृदय झकझोर हो उठा।उनकी संवेदना इन शब्दों में निकल पड़ी-
माल खायो ज्यांरौ त्यारौ रति नायौ मोह
कुबुद्धि सूं छायो भायो नहीं रमाकंत।
वेसासघात सूं काम कमायौ बुराई वाल़ो
माजनौ गमायौ नींबावतां रै महंत।।
कवि ने भरतपुर के स्वाभिमानी शासकों के साथ हुए इस विश्वासघात पर अफसोस जताते हुए लिखा कि जो हुआ वो बुरा हुआ।अब उसकी कथाएं किसी को सुनाने से क्या फायदा-
हूणौ हुतो सो हो गयो गल्लां सुणायां हुवै की हमै?
कीधो नींबावतां धायां रंग में कुरंग!!
बांकीदासजी न केवल स्वतंत्र चेता कवि थे अपितु वे बेबाक सत्य वक्ता भी थे।भलेही वे जोधपुर के कविराज थे लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों के साथ कदापि समझौता किया हो !!देखने में नहीं आया।
जहां राजकवि के कर्तव्य निर्वहन की बात हैं ,उन्होंने निष्ठा के साथ इस पद की मर्यादा कायम रखी परंतु जहां उन्हें लगा कि यहां सत्य को दबाया या छिपाया जा रहा है।वहां उन्होंने मौन पकड़ना मुनासिब नहीं समझा।सत्य की स्थापना के पक्षधर के रूप में अपनी मुखर अभिव्यक्ति की।उसी का परिणाम था कि उन्हें दो बार जोधपुर राज्य से  निर्वासित किया गया लेकिन उन्होंने अपने जीवनादर्शों से समझौता नहीं किया।इनके इसी स्वाभिमानी चरित्र की प्रशंसा करते हुए किसी समकालीन कवि ने कहा था-
बांका थारी बांक नै
काढ सक्यौ नह कोय। 
 क्रोड़ पसाव तो इक लियो
देश निकाल़ा दोय।।


क्रमशः
गिरधरदान रतनू दासोड़ी