Sunday, 24 September 2017

अथ श्री हैलमेट कथा


 

आखिरकार आज मैने हैलमेट खरीद ही लिया। सेंसेक्स की तरह डांवाडोल होती सरकारी नीतियों में मेरा मन निवेशको की तरह टालमटोल करता रहा परन्तु इस बार की हैलमेट अनिवार्यता की सख्ती ने सतारूढ पार्टी की तरह कुछ टिकाऊपन दिखाया है। इस टिकाऊपन को पूरा सम्मान मिलना ही था और मिला। मै हेलमेट विक्रेता की आंखों में देख रहा हूं। उसके चेहरे पर विजयी मुस्कान है पर मै हैलमेट पहनने से पहले अंतिम बार इसकी अनिवार्यता को फाइनल करना चाहता हूं इसलिये मैने अपनी मोटरसाइकिल उठाई और चौराहे की तरफ दौडा दी। सांगोपांग। सरकारी वर्दी अपने पूरें शबाब पर थी। पब्लिक का ट्रांसपोर्ट कतार में था और आम आदमी का एटीएम बिना पासवर्ड के नोट बरसा रहा था। मैने हथियार डाल दिये। हैलमेट खरीदने के सिवाय अब कोई चारा न था।

हैलमेट विक्र्रेता से कहा कि हैलमेट ऐसा दे कि जो हैलमेट होने की न्यूनतम मूलभूत आवश्यकताओं पर खरा उतरें और चालान के चपत से संकटमोचक की तरह मेरा बचाव कर दे बस। हैलमेट पहनने की कोशिश की पर इसमें एक टैक्नीकल प्रोब्लम है। बगैर चश्मा उतारे इसकों पहना नही जा सकता। फिर सोचा कि जब पूरा देश ही टैक्नीकल प्रोब्लम के चलते हमेशा समझौते करता रहता है तो फिर तुम क्यो नही। मैने छोटे स्तर के बडे समझोते के तहत चश्मा उतारकर हैलमेट को धारण किया। ये एक ऐतिहासिक क्षण है। मुझे चौराहा कुरूक्षेत्र सा नजर आने लगा। गाडियों के हाॅर्न में रणभेरी सुनाई देने लगी। आखिरकार मोटरसाइकिलशुदा जिन्दगी में मैने पहली बार हैलमेट को धारण किया है। प्रशासन के ढुलमूल रवैये ने मुझे इस दृष्य से वंचित रखा था। इस खरीदारी के बाद मै अचानक से गंगु तेली के चरित्र से निकलकर राजा भोज के चरित्र में आ चुका हूं। वो गंगू तेली जिसकी जेब से निकली हरी हरी पत्ती से ट्रेफिक हवलदार के घर पर हरी हरी सब्जिया आने लगी थी। वो गंगु तेली जिसके बिना हेलमेट पकडे जाने पर कोई हाकिम आगे नही आता क्योंकि वोट बैंक में उसका खाता मां बाप के गुजरने के बाद माइनस में चला गया था। माइनस खाते पर पेलन्टी लगनी ही थी।

 

मैने आज उन सभी चौराहों पर जाने का निर्णय लिया जिन पर कभी हैलमेट न होने की वजह से मै नही जा पाता था। आज मै ट्रेफिक हवलदार को उल्लू बनाना चाहता हूं। मुझे देखते ही जैसे ही उसका हाथ चालान बुक पर जायेगा और मै धमाके से हैलमेट सहित प्रकट हो जाउंगा। पेट मे गुदगुदी होने लगी। सरकारी हाकम को बेवकूफ बनता देखना हमारा कितना बडा ख्वाब है और आज शायद उस ख्वाब की परिणिती का दिवस है। हो सकता है भविष्य में इस दिन को जनता जनार्दन दिवस के नाम से संबोधित किया जायें। मेरी छोटी सी कारगुजारी मुझे दूसरी क्लास के बच्चों की नैतिक शिक्षा की किताब का हिस्सा बना सकती है। वाह..... मिशन को कामयाब बनाना होगा। मै मुख्य चैराहे पर पहुचा। इधर उधर नजर दौडाई। कही कोई हवलदार नही दिखा। मैने सोचा पान की दुकान गया होगा। यहा से बीच बीच में ये ट्रेफिक पाइंट पर भी दिख जाया करतें है। मैने इन्तजार किया। हवलदार तो फिर भी नही आया। मैने सोचा गर्मी में घर गया होगा। आ जायेगा। मैने और इंतजार किया। पर हवलदार को न आना था, इसलिये नही आया। मै खुद को ठगा हुआ सा महसूस कर रहा हूं। मई-जून की भरी गर्मी में हेलमेट पूरा साथ निभा रहा था...... मेरा नही... गर्मी का।

 

मैं आज बिना हवलदार को उल्लू बनाये घर जाना नही चाहता। आज मैं पूरी शान-ओ -शौकत के साथ चौराहा पार करना चाहता हूं। मैने गाडी खडी की और पनवाडी से हवलदार के बारे में पूछा। उसने बताया कि आमदनी कम होने के कारण उसने अपना पोइंट बदलवा लिया है। अब वो फूलबाग किनारे वाले पोइंट पर वसूली किया करता हैं। अहा.... ये हुई ना बात। मन में संतोष और आंनद का भाव लिये मै फूलबाग पोइंट की तरफ चल दिया। उल्टा रास्ता दस किलोमीटर का था पर भाव की संतुष्टि का मीटर किलोमीटर पर भारी पडा। दस किलोमीटर चलकर फूलबाग पोइंट पर पहुचा। पर हवलदार यहा भी नही था। इधर उधर नजर दौडाई पर नही दिखा। मुझे गुस्सा आने लगा। रोज जब मैं बगैर हैलमेट के चैराहे से निकलता हूं तो पता नही कहा से प्रकट होकर गाडी से चाबी निकालकर, गुटके का पीक थूककर चालान वसूल कर लेता है। और आज मैं हैलमेट से लैस होकर गाडी चला रहा हूं तो दिखाई ही नही दे रहा है। ये तो सरासर बेईमानी है। आज जब मै पैसे खर्च करके हैलमेट पहनकर गाडी चला रहा हूं तो ट्रेफिक हवलदार की ये जिम्मेदारी बनती है कि वो मेरी तरफ आशा भरी नजरो से देखें और मै उसको हैलमेट से जवाब दूं। पूरें देश का यही हाल है । भारतीय किक्रेट टीम चार मैच जीतकर सटोरियों के हौंसले खुलवाती है और उसके बाद दस मैच हारकर उनके हौसले को ससम्मान पस्त भी कर देती है। सरकार पेट्रोल डीजल की कीमत बार बार बढाती है तो आम आदमी अपनी गाडी की टंकी फुल करवा लेता है। टंकी फुल करते ही कीमतों मे कमी की घोषणा हो जाती है। ये बेईमानी नही है तो और क्या है। गर्मी में झुलसते हैलमेट से दिमाग और ज्यादा गर्म होने लगा। मैने हैलमैट उतारकर हाथ में लिया और गाडी घर की तरफ दौडा दी। अचानक से दौडती गाडी के बीच में हवलदार साहब आ गए। मै हक्का बक्का, हैरान, परेशान। देवता प्रकट हो ही गए। परन्तु आज तो मै खुश था। आज कोई चालान नही कटेगा। आज आम आदमी के विजय का दिवस है ।

कल्पनालोक में मैने खुद को भूखे नंगो के हाथों में उछलते हुए देखा। तभी हवलदार की कडक आवाज सुनाई दी। चालान 300 रूपया किस नाम से काटना है। मैने प्रतिरोध किया। हैलमैट होने पर चालान किस बात का। हवलदार ने यह कहकर मेरी और मेरी जनता जनार्दन दिवस की हवा निकाल दी कि हैलमेट पहनने के लिये होता है, हाथ में लेने के लिए नही। इसका तो चालान कटेगा ही कटेगा। मैने फीस लिये वकील की तरह खूब दलीले दी, नेताओ के चाटुकारों की तरह हवलदार चालीसा गाई, गब्बर के कब्जे में आई बसन्ती की तरह नाचा गाया, परन्तु वो एक ही राग अलापता रहा- मेरे हाथ में कुछ नही है। मेरे हाथ में कुछ नही है। थक हार कर मै 300 का चालान कटवाने लगा तो हवलदार फिर बोला- अरे में कह तो रहा हूं कि मेरे हाथ में कुछ नही है। मेरे हाथ में 200 रूपया दो और चलते बनो। चालान कटेगा तो सरकार की जेब में जायेगा। चेहरे पर मुस्कान आई। नुकसान में कुछ फायदा तो हुआ।

जनता जनार्दन दिवस मनाने वाले नंगो भूखों के हाथों से उछलता मै जमीन पर आ गिरा। ठगा ठगा और लाचार सा।


नवल किशोर व्यास