Thursday, 25 February 2021

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अग्निविद्या


लंका का राजा रावण दिग्विजय के लिए निकला। विशाल सेना साथ थी। मार्ग में कुबेर नामक राजा का राज्य आया। कुबेर की राजधानी अमरकंका पर रावण ने चढाई की, लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली। इसकी वजह यह थी कि बुकर असालिका नामक विद्या में पारंगत था। इस विद्या से उसने अपनी राजधानी के चारों ओर अग्नि का कोट बना दिया। इसके फलस्वरूप कोई भी उसकी राजधानी में प्रवेश नहीं कर सकता। जीतने का तो सवाल ही नहीं उठता। इस तरह उसका राज्य अजेय बना हुआ था। छह महीने तक रावण ने अमरकंका के बाहर पडाव डाले रखा। आखिर में वह निराश हो गया। एक दिन अचानक उसके पास कुबेर की दासी आई और बोली - महाराज ! आप इस राज्य पर कभी विजय हासिल नहीं कर सकंगे, क्योंकि हमारे राजा असालिका विद्या में पारंगत है। इसलिए उन्हें कोई हरा नहीं सकता। उन्हें हराने का एक ही उपाय है - रानी को अपनी ओर मिला लो। क्योंकि राजा ने यह विद्या उन्हें भी सिखाई है। रानी ने आपको महलों से देखा है। वह आप जैसे बलवान और विद्यावान राजा को चाहने लग गई है। रानी ने मेरे जरिए आफ पास प्रस्ताव भेजा है कि यदि आप उन्हें अपनाकर अपनी रानी बनाएं, तो वे आपको विजय दिला सकती है। रावण पहले नीतिवान और चरित्रवान भी था, उसने परस्त्री कहकर रानी का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। दासी को निराशा की मुद्रा में देख विभीषण ने इसका कारण पूछा। दासी ने सारा हाल कह सुनाया। विभीषण ने दासी से कहा - जाओ, रानी से कहो कि विभीषण ने उन्हें अपनी भाभी बनाना चाहता है और वह अपने भाई रावण को इसके लिए राजी कर लेगा। यह बात रावण को मालूम हुई, तो वह बहुत नाराज हुआ और उसने विभीषण से स्पष्टीकरण मांगा। विभीषण बोला - आपको उसे रानी नहीं बनाना है। यह तो हमारी एक राजनीतिक चाल है। हमें इस विद्या को सीखकर विजय प्राप्त करनी है। विभीषण की यह बात रावण को जंच गई।भोली रानी ने गुप्त मार्ग से आकर रावण को विद्या गुर बता दिया। विद्या दान के बाद रानी ने प्रणय प्रस्ताव रखा।रावण ने कहा - ज्ञान और विद्या सिखाने वाला गुरू होता है। आप मेरी गुरू माता है। मैं आफ बारे में बुरा सोच भी नहीं सकता। रानी परेशान हो गई उसने सारी बात विभीषण को बताई। विभीषण बोला- आपको मैंने भी भाभी कहकर पुकारा है। मैं नहीं चाहता कि मेरी भाभी कोई निन्दनीय और गलत काम करें। आपको यदि मेरे भाई स्वीकार भी कर लेंगे, तो आप उनकी उपपत्नी ही कहलाएंगी और आपको उनके पास कुबेर जैसा सम्मान नहीं मिलेगा। यह बात रानी को जंच गई और वह चुपचाप गुप्त मार्ग से अपने महलों में चली गई। रावण ने अमरकंका जीत ली और अपना चरित्रबल भी बनाए रखा। इसके बाद जैसे ही रावण ने सीता हरण किया और बुरी सोच को अपनाया तो उसका सर्वनाश हो गया।