Saturday, 23 January 2021

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ओल्ड डोल्यूमेंट का लोकार्पण

अनेक कहानियां सहज संदेश देती हुई स्त्री जीवन की मार्मिकता को भी सहज ढंग से व्यक्त करती

बीकानेर। कोई भी कहानी कहानीकार को बनी बनाई नहीं मिलती, उसे बनानी पड़ती है और कहानी बनाने के कौशल में सिद्धहस्त महेश चन्द्र जोशी अपनी कहानियों में अपने समय से जैसे संवाद करते हुए अपने समय को रचते-साकार करते हैं। उनकी कहानियों में उतार-चढाव, बुनियादी बेचैनी, मार्मिकता, रंजकता और कहानीपन के घटक उल्लेखनीय कहे जा सकते हैं। उक्त उद्गार शिविरा के पूर्व वरिष्ठ संपादक व कवि-समालोचक भवानीशंकर व्यास 'विनोदÓ ने होटल मरुधरा हेरिटेज में कहानीकार महेश चन्द्र जोशी के नए कहानी संग्रह 'ओल्ड डोल्यूमेंटÓ के लोकार्पण व स्मृति समारोह में व्यक्त करते हुए कहा कि जोशी की कहानियों का अंत उसे पढ़ते हुए पहले से पाठक को पता नहीं चलता और वह अनुमान से परे सामान्य-सी घटना मार्मिक जीवन-प्रसंग से जोड़ते हुए अनुभव जगत को संपन्न करने वाला व पाठक के भीतर उतर जाने वाला होता है। कहानीकार यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्रÓ, हरदर्शन सहगल, अन्नाराम सुदामा, सांवर दइया, महेश चन्द्र जोशी, कन्हैयालाल भाटी आदि की कथा-परंपरा ने जो भाव-भूमि सृजित की उसी के बल पर आज नई पीढी में अनेक रचनाकार कहानीकार के रूप में सक्रिय है।कार्यक्रम के आरंभ में स्व. महेश चन्द्र जोशी के चित्र पर माल्यापर्ण व पुष्पांजलि के साथ अतिथियों,  पारिवारिक जनों एवं कार्यक्रम में शामिल लेखक-कवियों-पाठकों ने अपने श्रद्धासुमन अर्पित किए। कवि-आलोचक डॉ नीरज दइया ने कार्यक्रम में कहानीकार महेश चन्द्र जोशी का परिचय प्रस्तुत करते हुए हिंदी कहानी परंपरा के संदर्भ में जोशी की कथा-यात्रा की विस्तार से चर्चा की तथा महेश चन्द्र जोशी को अपनी पीढ़ी का बेजोड़ कहानीकार बताया। महेश चन्द्र जोशी की पुत्री मंदाकिनी जोशी ने कहानी पुस्तक के आरंभ में प्रस्तुत अपनी बात का पाठ प्रस्तुत किया जिसमें मार्मिक प्रसंग में वे भावुक हो गई और अपना पाठ पूरा नहीं पढ सकीं। कार्यक्रम में प्रसिद्ध कहानीकारप्रमोद कुमार शर्मा ने जोशी की कहानी रोको, यह सौदेबाजी का पाठ प्रस्तुत किया। कहानीकार नवनीत पाण्डे व पूर्णिमा मित्रा ने संस्मरणों के साथ जोशी की कहानी-यात्रा के संबंध में अपने विचार व्यक्त किए। मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए प्रख्यात कहानीकार हरदर्शन सहगल ने कहानीकार महेश चन्द्र जोशी से जुड़े अनेक संस्मरणों में उन्हे स्मरण करते हुए अनेक पारिवारिक आत्मीय प्रसंग उजागर किए, वहीं कहा कि जो बाते मंदाकिनी जोशी ने पुस्तक की भूमिका के रूप में लिखते हुए लिखा उनसे मेरी सहमति है और ऐसा ही कुछ मैं कहने वाला था। उन्होने कहा कि कहानियों में आत्मीयता का वर्णन व्यापक शब्दों में अव्यक्त भावनाओं के रूप में जो पात्रों के माध्यम से वर्णित की जाती है उसका वर्णन- व्याख्या सहज संभव नहीं। शीर्षक कहानी पर चर्चा करते हुए उन्होने कहा कि काम करने वालों को प्रताडऩा का मिलना इस कहानी में जैसे उभार कर कहानीकार ने प्रस्तुत किया है वह रेखांकित किए जाने योग्य है। कहानी लेखन की तकनीकी बातों के विषय में बताते हुए सहगल ने कहा कि साहित्य यदि दर्पण है तो दर्पण में दाएं का बायां और बाए का दाया स्वरूप दिखाई देता है जो वास्तविकता या यथार्थ नहीं है। मुख्य अतिथि उपध्यानचंद कोचर ने कहा कि महेश चन्द्र जोशी की कहानियों के केंद्र में एक संदेश सधनता के साथ देखा जा सकता है कि मनुष्य को दुर्बलता नहीं रखनी चाहिए, उसे सच का सामना करते हुए जीवन संघर्ष में आशावादी रूप रखना चाहिए। लेखक की अनेक कहानियां सहज संदेश देती हुई स्त्री जीवन की मार्मिकता को भी सहज ढंग से व्यक्त करती है। 

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