Wednesday, 02 December 2020

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खुशहाली की खुशबू से खिला निर्मल ग्राम बरसिंहसर

गांव में ६५२७ की आबादी के १०१० परिवार हैं। आदर्श ग्राम बनने से पहले २३ बी.पी.एल. परिवारों के पास ही शौचालय सुविधा थी। नवम्बर २००६ तक शेष बचे २४२ बी.पी.एल. और ३३० ए.पी.एल. परिवारों को शौचालय सुविधा उपलब्ध करा दी गई है। अब कुल ३५१ बी.पी.एल. और १००१ ए.पी.एल. परिवारों में शौचालय सुविधा उपलब्ध होने के कारण यह गांव खुले में शौच जाने से पूर्णतः मुक्त गांव घोषित कर दिया गया है। ’’निर्मल ग्राम पुरस्कार‘‘ मुख्यतः इसी कसौटी पर खरा उतरने वाले गांव को दिया जाता है।

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बलखाती नई बनी सडकें, पक्के मकान, हर घर में ट्रेक्टर, पानी के पर्याप्त ट्यूबवैल, बिजली की समुचित उपलब्धता और खुशियों से दमकते चेहरों वाले ग्रामीण।
 किसी भी खुशहाल गांव के लिये ये सब चीजें पर्याप्त हैं। आज बीकानेर के बरसिंहसर गांव को देखें तो ये कल्पना साकार रूप में दिखाई देती है। पर इस खुशहाली के सूत्र केवल नेवेली लिग्नाइट परियोजना में नहीं छिपे हैं। इसके सूत्रधार हैं स्टेट रिसोर्स सेन्टर के श्री अरूण सुराणा, बरसिहंसर ग्राम पंचायत के सरपंच श्री रूगाराम और वे असंख्य ग्रामवासी जिन्होंने बरसों पुरानी रूढयों को त्याग कर स्वस्थ परंपराओं को अपनाया है।
 रूगाराम जी कहते हैं इसका सारा श्रेय सरकार और यूनिसेफ को जाता है। मेरे मन में तो केवल इतना सा था कि मेरे गांव का नाम ऊंचा हो।
 रूगाराम राजस्थान के उन २२ ग्राम सरपंचों में से एक हैं जिन्हें ‘‘निर्मल ग्राम पुरस्कार’’ वर्ष २००६ से राष्ट्रपति के हाथों मई के पहले सप्ताह में पुरस्कृत होना है।
रूगाराम के इस गांव में आदर्श गांव का हर बिंदु स्पष्ट दिखाई देता है। गांव में ६५२७ की आबादी के १०१० परिवार हैं। आदर्श ग्राम बनने से पहले २३ बी.पी.एल. परिवारों के पास ही शौचालय सुविधा थी। नवम्बर २००६ तक शेष बचे २४२ बी.पी.एल. और ३३० ए.पी.एल. परिवारों को शौचालय सुविधा उपलब्ध करा दी गई है। अब कुल ३५१ बी.पी.एल. और १००१ ए.पी.एल. परिवारों में शौचालय सुविधा उपलब्ध होने के कारण यह गांव खुले में शौच जाने से पूर्णतः मुक्त गांव घोषित कर दिया गया है। ’’निर्मल ग्राम पुरस्कार‘‘ मुख्यतः इसी कसौटी पर खरा उतरने वाले गांव को दिया जाता है। गांव में ५ स्कूल, ४ आगंनबाडी केन्द्र और एक हायर सैकेन्ड्री स्कूल है जिसमें टोटल सेनीटेशन केम्पेन यानि टी.एस.सी. योजना के जरिये शौचालय सुविधा, पीने के पानी की शुद्धता, पर्यावरण संतुलन आदि के मापदण्डों के अनुसार सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। गांव में कोई भी घर, आंगनबाडी स्कूल आदि शौचालय विहीन नहीं है। स्कूलों में लडके-लडकियों के लिये अलग-अलग शौचालय हैं। स्वच्छता के नारों से पटे इस गांव में कहीं गंदगी का नामोनिशान नहीं है।
 निर्मल ग्राम पुरस्कार के महत्व का अदांजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष १९८१ में केवल १ प्रतिशत स्वच्छता कवरेज थी और ३ करोड से ज्यादा लोग स्वच्छता नहीं रखने के कारण रोगग्रस्त थे। इससे १८ करोड मानव श्रम दिवसों और १,२०० करोड रुपए की क्षति का अंदाजा लगाया गया था। वर्ष १९८६ में पहली बार केन्द्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम के जरिए इस क्षति की पूर्ति करने का मानस बनाया गया।
रूगाराम जी कहते हैं कि बीकानेर के पूर्व जिला कलेक्टर श्री आलोक और स्टेट रिसर्स सेंटर के श्री अरूण सुराणा इस गांव के कायापलट के प्रेरक हैं।
यह विनम्रता ही रूगाराम जैसे सरपंचो की पूंजी है। जबकि गांव के लोग कहते हैं कि सरपंच ने डंडी वाले लोटे, खाना रखने का पिंजरा, सोख्ता खड्डों के लिये सहायता आदि देकर इस गांव के कायापलट में योगदान दिया है। कुछ चीजों पर तो उन्होंने घर की पूंजी और संसाधन भी लगाए हैं। चयनित परिवारों को शौचालय बनाने के लिए १२०० रुपए की सहायता प्रदान की जाती है पर २०० रुपए की डब्ल्यू सी की रूगाराम ने स्वयं व्यवस्था की। गांव में नालियां थीं ही नहीं तो रूगाराम जी ने स्वयं के मार्ग निर्देशन में १००० ’सोख्ता खाडे‘ यानि सोखने वाले गढ्ढे बनवाए। ड्रेनेज की इस पक्की व्यवस्था के कारण गांव भर में कंहीं भी आपको बहता हुआ पानी या कीचड भरी नाली नजर नहीं आएगी। हजार डंडी वाले लोटे भी रूगाराम ने स्वयं बटवाएं हैं और खाना सुरक्षित और स्वच्छ रखने का अनूठे ६०० से अधिक पिंजरे भी। रूगाराम कहते हैं ’’किसी ने इसके पैसे दिए किसी ने नहीं भी दिए, पर गांव में आज सब इसका इस्तेमाल कर रहे हैं, यही खुशी की बात है।‘‘ क्या वे इस व्यवस्था से प्रसन्न हैं इस प्रश्न के जवाब में वे कहते हैं, ’’पहले वाली शौच की व्यवस्था में पानी ना के बराबर खर्च होता था। अब पानी की खपत तो बढ गई है हालांकि गांव में ५ ट्यूबवैल हैं पर अभी दो और चाहिए।‘‘
गांव की समृद्धि में नेवेली लिग्नाइट परियोजना का योगदान स्वीकारते हुए वे कहते हैं, ’’जमीन के मुआवजे से मिले पैसे तो खर्च हो गए। अब परियोजना में आदमी लगें तो बात बने। परियोजना के कारण गांव में रास्ते की तकलीफ हो गई। अब ७ - ८ कि.मी. घूमकर आना पडता है। मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया है रास्ता बनाने के लिये। यदि ये हो गया तो गांव और तरक्की करेगा।‘‘
बहरहाल गांव के पक्के घर, गांव की चौपड पर चौपड खेलते खुशहाल ग्रामीण और घरों में शौचालय निर्माण के कारण सुरक्षित और निष्फिक्र हुई औरतों के चेहरे, गांव की खुशहाली की कहानी खुद बखुद बयान करते हैं। इन्हें किसी प्रमाण की आवश्यकता नही है।

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