Thursday, 19 April 2018
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आपणो राजस्थान आपणी राजस्थानी नारे को दिल में बसाएं

मातृभाषा चेतना गोष्ठी आयोजित

हनुमानगढ. रविवार को यहां दुर्गा मंदिर स्थित कमला निवास पर मरुधरा साहित्य परिषद की ओर से मातृभाषा चेतना गोष्ठी हुई जिसमें वक्ताओं ने जनगणना के दौरान मातृभाषा के कॉलम में राजस्थानी लिखवाने का आह्वान किया।

गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए पीलीबंगा से आए वरिष्ठ साहित्यकार निशांत ने कहा कि राजस्थानी एक अत्यंत समृद्ध भाषा है तथा इसका विस्तार पूरे राजस्थान, मध्यप्रदेश के कई जिलों, पंजाब के अबोहर, फिरोजपुर, हरियाणा के हिसार व सिरसा जिलों तथा पाकिस्तान के कुछ भू-भाग तक है। वरिष्ठ साहित्यकार ओम पुरोहित ‘कागद’ ने कहा कि पंजाबी में भी पोवाधि, भटियाणी, रेचना, मलवई, सेरायकी, मांझी, दोआबी आदि अनेक बोलियां है, मगर वहां मातृभाषा के प्रति चेतना है और सभी पंजाबी लोग अपनी मातृभाषा पंजाबी ही दर्ज करवाते हैं। उन्होंने कहा कि मां, मातृभूमि और मातृभाषा का दर्जा स्वर्ग से भी ऊंचा होता है और हमें अपनी मातृभाषा के प्रति सम्मान का भाव रखना चाहिए। सूरतगढ से पधारे हिन्दी व राजस्थानी के प्रखयात आलोचक डॉ. नीरज दईया ने कहा कि किसी भी भाषा की बोलियां उसकी संपन्नता की परिचायक होती हैं, राजस्थानी भी इस दृष्टि से संपन्न है तथा हमें बोलियों के भेद को भुलाकर जनगणना के मातृभाषा के कॉलम में राजस्थानी ही दर्ज करवाना चाहिए। महाजन से पधारे डॉ. मदनगोपाल लढा ने कहा कि प्राचीनता, भाषा-विज्ञान, साहित्य, व्याकरण तथा शब्दकोश की दृष्टि से हमारी भाषा अत्यंत समृद्ध है तथा हमारे समस्त लोकाचार इसी भाषा में होते हैं। गोष्ठी का संचालन करते हुए डॉ. सत्य॰नारायण सोनी ने पंजाबी भाइयों से प्रेरणा लेने की अपील करते हुए कहा कि ‘साडा पंजाब, साडी पंजाबी’ की तरह हमें ‘आपणो राजस्थान, आपणी राजस्थानी’ नारे को हमेशा अपने दिल में बसाए रखना चाहिए। परिषद के सचिव नरेश मेहन ने आभार जताते हुए कहा कि राजस्थानी राजस्थान की पहचान है और इसी भाषा के बल पर राजस्थानी संस्कृति की दुनिया में विशिष्ठ छवि है। गोष्ठी में प्रवीण पुरोहित, नंदलाल दिव्य तथा अंकिता पुरोहित ने भी विचार रखे।

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