Tuesday, 26 January 2021

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नृसिंह मेलों मे उमडा भक्ति और श्रृद्धा का ज्वार

Narsingh Mandir at Daga Chowk, Bikanerबीकानेर, सनातन धर्म मे भगवान और उसकी भक्ति को सिद्ध करने वाले भक्त प्रह्लाद की भगवान नृसिंह के प्रति अटृट आस्था को लेकर शहर के विभिन्न हिस्सों मे आज नृसिंह लीला का आयोजन किया गया।

बीकानेर मे नृसिंह लीला के रूप मे जाने जाये वाले इन मेलों का आयोजन लखोटियों के चौक के साथ ही डागा चौक, दुजारियों की गली, नत्थुसर गेट और लालाणी व्यासों के चौक मे आयोजित किया जाता है। इन मेलों के देखने के लिए हजारों लोगों की भीड उमडती है वही श्रृद्धा का ज्वार देखते ही बनता है।

पुराने समय से चली आ रही इस मेला परम्परा के बारे मे शहर के वयोवृद्ध जानकार बताते है कि यह मेले तो हम अपने जन्म से देखते आ रहे है।  और बीकानेर मे सर्वप्रथम इस मेले आयोजन स्थल लखोटिया चौंक निवासी गोपाल व्यास बताते है कि बीकानेर शहर मे सर्वप्रथम लखोटियां और डागा जाति के लोगों ने लखोटियों चौक स्थित नृसिंह मन्दिर से मेले की परम्परा डाली और पिछले ४५० वर्षो से अनवरत इस का आयोजन होता आ रहा है। इस आधुनिक समय मे जहाँ परम्पराये दम तोड रही है वहीं यहां पर 47 डिग्री के तापमान मे भी छोटी छोटी जगहों मे आयोजित इन मेलों मे हजारों लोगों की भीड का उत्साह देखते ही बनता है। व्यास ने बाताया कि जो पुरूष नृसिंह का रूप लेता है उसके लगाया जाने वाला मुखौटा एवं पुरी वेशभुषा मुल्तान (पाकिस्तान) से लायी गई थी जो आज भी उपयोग की जाती है।

लालाणी व्यासों के चौक के मेले  के आयोजनकर्ता ने बताया कि हमारे यहां इस मेले के आयोजन पिछले ३६ वर्षो से किया जा रहा है और जिसमें बच्चों व महिलाओं के साथ युवाओ व वृद्धजनों ने भी बढचढ कर हिस्सा लेते हैं।

नृसिह लीला के प्रसंग मे दैत्य हरिण्यकश्यप ने अपनी अति महत्वकांक्षा मे आकर भगवान की भक्ति करते असंभव अमरत्व का वरदान मांगा तो भगवान ने उनको कहा यह संभव नही है किसी को अमरत्व नही मिला भगवान को भी नही। आप कोई और वरदान मांगों तो उसने सभी भौतिक स्थितियों का जिक्र करते हुए कहा कि कि मुझे ना पुरूष मारे न स्त्री, न अस्त्र से मरू ना शस्त्र से, न दिन मे मरू ना रात मे मरू, ना सुबह ना शाम को मरू, न पशु से ना पक्षी से, ना धरती पर मरूं ना आकाश मरू। भगवान ने तथास्तु कह दिया। और इस वरदान के बल पर हरिण्यकश्यप अपने को अमर समझते हुए खुद को भगवान से भी ऊपर समझने लगा और संतो के साथ ही आमजन को कष्ट देने लगा लेकिन अपने पुत्र प्रहलाद की भगवान के प्रति भक्ति क पार ना पा सका। भगवान को अपने भक्त प्रहलाद के रक्षार्थ अपने वरदान की सीमाओं मे रहते हुए सभी विशिष्ठ स्थितियों के साथ एक खम्भें से प्रकट होते हुए शेर के सिर और नर के धड से बने नृसिंह रूप को धारण कर सायं पूर्व हिरण्कश्यप का वध किया। और इसी परम्परा के अनुसार उसका वध दोपहर बाद लेकिन शाम होने से पहले किया जाता है।

मेला स्थलों पर अपार भीड को देखते हुए पुलिस प्रशासन भी सभी जगहों पर चाकचौबंद था।  

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