Friday, 04 December 2020

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मनुष्य का तो सिर्फ संकल्प होता है कृपा ईश्वर की - दिव्यानंद

बांसवाडा पहुंचने पर भानपुरा पीठ के शंकराचार्य का भव्य स्वागत

बांसवाडा, मनुष्य का तो सिर्फ संकल्प होता है लेकिन कृपा तो ईश्वर की ही होती है। देवर्षि नारद कहते है कि भगवान गणेश के बारह नामों का स्मरण मात्र करने से सभी तरह की कामनाएं पुरी होती है। अतः हमें प्रथम पूज्य गणेश का सदैव स्मरण करना चाहिए। उक्त आह्वान भानपुरा पीठ के शंकराचार्य दिव्यानंद महाराज ने रविवार को श्री सिद्धि विनायक गणपति मंदिर में स्वर्ण शिखर प्रतिष्ठा महोत्सव के तीसरे दिन आयोजित धर्म सभा में व्यक्त किए। शंकराचार्य ने बताया कि वेद बताते है कि माता और पिता देवताओं के समान है। सृष्टि में ब्रह्मा भगवान है लेकिन वृष्टि में माता-पिता ही। उन्होंने कहा कि माता-पिता शिव-शक्ति का प्रतीक है, जो व्यक्ति अपने माता-पिता की सेवा नहीं करता उसे पाषाण की प्रतिमाओं से कोई अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। शंकराचार्य ने कहा कि शक्ति के लिए युद्ध प्राचीन समय से ही चल रहा है। ब्रह्मा-विष्णु के बीच हुए विवाद में भगवान शिव अरूणाचल के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने भगवान गणेश की उत्पत्ति के संबंध में दो कथाओं का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को मुषक की तरह उद्योग नीति अपनानी चाहिए तभी उसे रिद्धी सिद्धि मिलेगी। आलसी को न तो स्वयं और न ही सम्मान और रिद्धी-सिद्धि मिल पाती है। शंकराचार्य ने कहा कि सनातन धर्म सबके मंगल की कमना करता है। उन्होंने कविताई अंदाज में कहा कि कितना ही उड ले आकाश पर चारा तो है धरती के पास इसलिए व्यक्ति को कल्पनाओं के पंख पर नहीं उडना चाहिए। इस अवसर पर ख्यातनाम ध्यान योगी महर्षि उत्तम स्वामी ने बताया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने एक बार के आग्रह में एक करोड की घोषणा की जिसमें से 70 लाख सरकार व 30 लाख रुपए बांसवाडा की जनता का रहा आज यह मंदिर भव्य रूप ले चुका है। उन्होंने संतों के महात्म्य को बताते हुए कहा कि संतों के दर्शन मात्र से जीवन मूल्य बदल जाते हैं। उन्होंने बताया कि बांसवाडा वेदोक्त व शास्त्रोक्त दृष्टि से परिपूर्ण है। यहां बारह ज्योतिर्लिंग के दर्शन होते हैं। प्रारंभ में गणेश भक्त मंडल के अध्यक्ष डॉ. दीपक द्विवेदी व भागवत समिति के अध्यक्ष शंकरलाल दोसी ने संतों एवं अतिथियों का शब्द सुमनों से स्वागत किया। धर्म सभा का संचालन ख्यातनाम मंच संचालक ब्रजमोहन तूफान ने किया जबकि आभार डॉ. रविन्द्र लाल मेहता ने माना।


शंकर सबको साथ लेकर चलते है - शंकराचार्य दिव्यानंद महाराज ने कहा कि भगवान शंकर सभी विरोधियों को एक साथ लेकर चलते है। उन्होंने बताया कि भगवान शंकर के घर चुहा, नाग, मोर जो सभी एक दूसरे के विरोधी है लेकिन एक साथ रहते है। अतः विरोधियों को साथ लेकर चलने की कला सिखनी होगी तो भगवान शंकर से सिखी जा सकती है।


हजारों का पिता हूँ - दिव्यानंद महाराज ने कहा कि पिता का हृदय आकाश के समान विशाल होता है। उन्होंने बताया कि उनके पिता की ईच्छा थी कि वे भी पिता बने लेकिन अपने पिता की ईच्छा तो वे पूरी नहीं कर पाए लेकिन आज हजारों लोग उन्हें पिता तुल्य मानते है। उन्होंने कहा कि समाज विसंगतियों की ध्यान आकर्षित करना हमारा कर्तव्य है। उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या एवं भ्रूण हत्या को महापाप करार दिया।


वैदिक ऋचाओं का गान - शंकराचार्य दिव्यानंद जी के धर्म सभा स्थल पर पहुंचने पर पंडित दिव्य भारत पंड्या के आचार्यत्व में मंगलाचरण हुआ। बाद में विप्रवरों ने चार वेदों की अमृतवाणियां सुनाई तो पूरा पांडाल झूम उठा। शंकरचार्य ने वेदों को दिव्य बताते हुए कहा कि इनसे हम जीवन की सफलता का मार्ग पा सकते है।


दिवंगतों का याद किया - गणेश भक्त मंडल के अध्यक्ष डॉ. दीपक द्विवेदी ने स्वागत उद्बोधन के दौरान इस मंदिर निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाने वाले स्वर्गीय पन्नालाल नागर, स्व. सूर्यकरण गुप्ता आदि का स्मरण करते हुए बताया कि इन लोगों के अथक प्रयास से ही मंदिर का निर्माण संभव हुआ। उन्होंने बताया कि स्व. पन्नालाल नगार ने महर्षि उत्तम स्वामी जी से इस मंदिर के जीर्णोद्धार का आग्रह किया और उत्तम स्वामीजी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे तक इस आग्रह को पहुंचाया। फलस्वरूप 12 घंटे में इसके लिए एक करोड की राशि स्वीकृत हुई।

- दीपक भारत श्रीमाल

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