Sunday, 01 August 2021

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बच्चों ने तैयार किया आपना घोषणा पत्र

अपनी पसंद की दुनिया बनाने के लिए किया तैयार

बीकानेर । देश भर के बच्चों ने वर्ष 2014 के आम चुनावों के लिए विभिन्न राजनैतिक दलों के राष्ट्रीय घोषणा पत्रों में 2015 के बाद के मिलेनियम डेवलपमेंट गोल (एमडीजी) एजेंडा में अपने अधिकारों को शामिल करने की मांग की। राष्ट्रीय बाल सुनवाई ध् नेशनल चिल्ड्रेन कंसलटेशन ने देश भर के करीब 100 बच्चों को एकजुट किया और इसका मकसद था, \'बच्चे जैसा भारत ध् दुनिया चाहते हैंÓ पर एक प्रेरक और सामूहिक चर्चा करना तथा इसपर वार्ता शुरू करने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय सहमति बनाना। इसमें बच्चों के लिए सरकार, नागरिक समाज और दूसरे स्टेक धारकों की स्पष्ट सिफारिशें हों। इस कंसलटेशन के 11 बच्चे 68वें संयुक्त राष्ट्र जनरल असेम्बली के आस-पास होने वाले एक हस्तक्षेप में भाग ले रहे हैं जो सितंबर में न्यूयॉर्क में होने वाला है।  

यंहा पर वल्र्ड विजन से मिली जानकारी के अनुसार राष्ट्रीय बाल सुनवाई ध् नेशनल चिल्ड्रेन कंसलटेशन नाइन इज माइन के बैनर तले 31 राज्यों के कंसलटेशन अभियान वादा ना तोड़ो का नतीजा है। इसे अन्य मानवीय संगठनों जैसे वल्र्ड विजन इंडिया, ऐक्शन एड (इंडिया), सेव दि चिल्ड्रेन और अन्य राज्य साझेदारों के साथ चलाया गया जो शुरू से ही इस प्रक्रिया से जुड़े रहे हैं।  दुनिया भर के विकास एजंडा से संकेत लेते हुए और 2014 के आम चुनावों के लिए राजनैतिक दलों के चुनाव घोषणा पत्र में बच्चों का प्रतिनिधित्व होने होने की आवश्यकता के मद्देनजर नाइन इज माइन ने राष्ट्रीय बाल सुनवाई के अनुकूल बच्चो के लिए रचनात्मक प्रक्रिया तैयार की। यह बाल अधिकार (सीआरसी) पर संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन पर आधारित था ताकि 2015 के बाद के एजंडा में बच्चों की आवाज को रिकॉर्ड किया जाए और पहचाना जाए। आईडिया यह था कि बच्चों के लिए सही अर्थों में एक प्रतिनिधि घोषणा पत्र तैयार किया जाए जिसे \'बच्चे जैसा भारत ध् दुनिया चाहते हैं दृ बच्चों का एक घोषणा पत्रÓ कहा जाए। इसमें बच्चों द्वारा घोषित सिफारिशें और ऐसी चीजें होंगी जिनपर सौदा नहीं किया जा सकेगा।   इसके अनुसार ही देश भर में हुई बाल सुनवाई के दौरान बच्चों की जो राय सामने आई उनमें एक इस प्रकार है, "सरकार ने नाभिकीय पनडुब्बियों पर 3000 करोड़ रुपए खर्च किए पर बच्चों के लिए स्कूल में साफ पानी पर सिर्फ कुछ हजार रुपए खर्च किए गए और उसका पानी भी बच्चों को नहीं मिलता है जबकि बच्चों को जो पानी मिलता है वह कीड़े मकोड़ों से भरा होता है ... इसलिए, पनडुब्बियों के लिए 3000 करोड़ रुपए और हम बच्चों के लिए मरी हुई मक्खियां।"ज्यादातर सुनवाई में बच्चों ने अपने यहां अच्छी सड़क, अस्पताल और विद्युत आपूर्ति, अच्छे शिक्षक और स्कूल, सिंचाई के लिए पानी, भेदभाव न करने, अच्छे पुलिस बल और आंदोलनों व बैंड्स को खत्म करने की मांग की। बच्चों ने यह मांग भी की कि बाल मजदूरी और बाल विवाह समाप्त किए जाएं तथा स्कूलों में पानी व साफ-सफाई की अच्छी सुविधा हो।  

राष्ट्रीय बाल सुनवाई  नेशनल चिल्ड्रेन कंसलटेशन ने बाल अधिकारों पर विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं की एक चर्चा सुनी। इनमें डॉ. जयकुमार क्रिश्चियन, नेशनल डायरेक्टर, वल्र्ड विजन इंडिया, सुश्री रजिया सुल्तान इस्माइल अब्बासी, संयोजक, इंडियन अलायंस फॉर चाइल्ड राइट्स (आईएसीआर), पॉल दिवाकर, नेशनल कैमपेन कनवेनर, वादा ना तोड़ो अभियान और अंबरीष राय, राष्ट्रीय संयोजक, आरटीई फोरम, बी इलैंगो, टेक्निकल एडवाइजर, चाइल्ड पार्टिसिपेशन, प्लान इंडिया, इनाक्क्षी गांगुली (एचएक्यू), फादर एलेक्स दृ जन विकास समिति, एनी नमला (सीएसईआई), एलेक्स जॉर्ज, लीडर नॉलेज ऐक्विस्ट हब चाइल्ड राइट्स ऐक्शन हेड इंडिया, अविनाश कुमार, डायरेक्टर, पॉलिसी रिसर्च एंड कैमपेन  ऑक्सफैम शामिल है।राष्ट्रीय बाल सुनवाई ध् नेशनल चिल्ड्रेन कंसलटेशन के जरिए एक बार बच्चे अपना घोषणा पत्र तैयार कर लें तो बच्चे सांसदों का दरवाजा खटखटाएंगे ताकि राष्ट्रीय घोषणापत्रों को प्रभावित किया जा सके और बच्चों का घोषणा पत्र एमईए के प्रतिनिधि को सौंपा जाएगा। ताकि वे संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया दे सकें और बच्चों का घोषणापत्र भारत में संयुक्त राष्ट्र की स्थानीय प्रतिनिधि सुश्री लिसे ग्रांडे के पास जमा कराया जाएगा।  वर्ष 2000 में दुनिया भर की 193 सरकारों ने 2015 तक आठ मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स (एमडीजी) हासिल करने की सहमति दी थी। ये लक्ष्य गरीबी और भूख दूर करने, सबों के लिए शिक्षा, पुरुषों और महिलाओं में बराबरी, प्रसव के समय बच्चे और मां की मौत के मामले कम करने, एड्स, मलेरिया जैसी बीमारियों से निपटना और पर्यावरण को बेहतर करने से संबंधित हैं। दुनिया भर की रपटों से यह स्पष्ट है कि भारत समेत ज्यादातर विकासशील देश 2015 तक निर्धारित लक्ष्य हासिल करने में निश्चित रूप से नाकाम रहेंगे। एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय निबंध भी है जिसका अंतरराष्ट्रीय विकास एजंडा पर प्रभुत्व रहा है। और यह संयुक्त राष्ट्र के एमडीजी की स्थापना के समय से है और वह यह कि एमडीजी गरीबी और गैर बराबरी के ढांचागत कारण को दूर करने में नाकाम रहा क्योंकि वे संबंधित सेक्शन के प्रतिनिधि और उनके अनुकूल नहीं थे। भारत में पिछले दो दशक के दौरान जो महत्त्वपूर्ण आर्थिक विकास हुए हैं उसके बावजूद मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स (एमडीजी) हासिल करने के लिहाज से पटरी पर नहीं है खासकर एमडीजी 4 जो 2015 तक बाल नश्वरता को दो तिहाई कम करने और एमडीजी 5 जो मां का स्वास्थ्य ठीक करने के लिए है। भारत में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत के मामले 1990 से 2010 के बीच 45 प्रतिशत कम हुए हैं पर पिछले दशक के दौरान यह कमी बहुत धीमी हो गई है। इस तरह, एमडीजी4 लक्ष्य हासिल करने की दिशा में भारत की प्रगति अपर्याप्त है और यही हाल 2015 तक पांच साल से कम उम्र में मौत के मामले 1000 जन्म में 38 करने में भी है। 
भारत सरकार ने 2004 में स्वास्थ्य पर अपना खर्च 2012 तक जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का 2-3 प्रतिशत करने का वादा किया था पर 2012-13 के दौरान स्वास्थ्य पर सरकार का खर्च जीडीपी के 1 प्रतिशत के आस-पास ही एवरी वूमैन, एवरी चाइल्ड पहल के तहत भारत को अपने 235 जिलों में बच्चों और मां के स्वास्थ्य के लिए प्रयासों को मजबूत करना है। ये वो जिले हैं जहां देश भर में होने वाले मां और नवजात शिशुओं की मौत के 70 प्रतिशत मामले होते हैं।  बाल सुनवाई आयोजन होता है तो बच्चे मौजूद रहते हैं जो वहां व्यक्त किए जाने वाले विचारों और परिप्रेक्ष्य के साथ उनके जीवन को प्रभावित करने वाली योजनाओं और पबलिक डिलीवरी सेवाओं को रिकॉर्ड और रिपोर्ट करते हैं। बच्चों को प्रेरित किया जाता है कि सरकारी डिलीवरी स्कीम और अधिकारों में वे जो परिवर्तन चाहते हैं उनके संबंध में सिफारिश करें और इसकी व्यवस्था सुनिश्चित करें। इससे बच्चों का घोषणा पत्र तैयार करने में सहायता मिलती है और यह वैज्ञानिक तथा बच्चों के अनुकूल होता है। इसमें मैपिंग और ऐसेसमेंट मेकैनिज्म भी होता है जो संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के दिशानिर्देश देने वाले सिद्धांतों पर आधारित होता है। इस प्रक्रिया के तहत न सिर्फ बच्चों के नजरिए से असुरक्षा को रिकॉर्ड किया जाता है बल्कि यह बच्चों को प्रेरित करता है कि वे सुधार के उपाय सुझाएं और उस दुनिया के लिए अपनी सिफारिश करें जिसमें रहने की उम्मीद वे करते हैं।    
 

 

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