Tuesday, 28 September 2021

KhabarExpress.com : Local To Global News
  2730 view   Add Comment

रोगाणु कल्चर को हिसार में संग्रहित करवाएगा

अनुसंधान और बीमारियों के अध्ययन के लिए उपलब्ध

बीकानेर। वेटरनरी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. ए.के. गहलोत ने राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केन्द्र, हिसार में गत दिनों वैज्ञानिक-अधिकारियों के साथ एक बैठक में विचार-विनिमय कर केन्द्र की गतिविधियों का अवलोकन किया। अश्व अनुसंधान केन्द्र के निदेशक डॉ. आर.के. सिंह ने वेटरनरी टाइप कल्चर केन्द्र (वी.टी.सी.) की कार्यवाही की जानकारी दी। वेटरनरी विश्वविद्यालय, बीकानेर अपने यहां संग्रहित रोगाणुओं के कल्चर को चिर स्थाई संग्रहण के लिए अपने नाम से वेटरनरी टाइप कल्चर केन्द्र, हिसार में संग्रहित करवाएगा। भविष्य में आवश्यकता पडऩे पर संग्रहित रोगाणु कल्चर वापिस लिये जा सकेगें और देश-विदेश के शोधार्थियों के लिए अनुसंधान और बीमारियों के अध्ययन के लिए उपलब्ध रहेगें। वेटरनरी विश्वविद्यालय, और राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर के बीच शिक्षा व अनुसंधान कार्यों हेतु हुए एम.ओ.यू. के तहत घोडों में कृत्रिम गर्भाधान का कार्य यहंा शुरू किया जाएगा। कुलपति प्रो. गहलोत ने बताया कि विश्वविद्यालय की इस नई पहल से अश्वपालकों को अपनी घोड़ी को उन्नत नस्ल के घोडों से प्रजनन कराने की एक वैज्ञानिक और अत्याधुनिक सुविधा प्राप्त हो सकेगी। वेटरनरी विद्यार्थियों को भी इस प्रायोगिक तकनीक को समझने का अवसर प्राप्त होगा एवं शोध को नए आयाम मिलेगे। घोडिय़ों में कृत्रिम गर्भाधान के लिए शुरू में मारवाड़ी नस्ल के घोड़ों के सीमन का प्रयोग किया जाएगा। घोडों की मारवाड़ी नस्ल भारत वर्ष के रियासतकाल में अपनी कद काठी, दमखम और स्वामिभक्ति की एक मिसाल रही है। रेगिस्तान के मारवाड क्षेत्र की प्रसिद्ध नस्ल और प्राचीन भारत की युद्ध कला में अग्रणी भूमिका और राजपूत शासकों की शान बने मारवाडी घोडों का उद्गम 1193 ईस्वीं माना गया है। इस नस्ल के घुडसवारों के भावनात्मक लगाव के किस्से आज भी मशहूर है। मेवाड़ के शासक महाराणा प्रताप का चेतक भी इसी प्रजाति से था।

Tag

Share this news

Post your comment